पाकिस्तान की लंबी छलांग जानें क्यों दुनिया को हैरान कर रही है यह 1.5 बिलियन डॉलर की डिफेंस डील?

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News India Live, Digital Desk: दुनिया की नज़र में पाकिस्तान की छवि अक्सर कर्ज़ लेने वाले देश की रही है, लेकिन हाल ही में रक्षा गलियारों से आई एक खबर ने सबको चौंका दिया है। खबर है कि पाकिस्तान एक प्रमुख मुस्लिम देश (इराक़ या अज़रबैजान की चर्चाओं के बीच) के साथ 1.5 बिलियन डॉलर (करीब 12,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा) का एक बहुत बड़ा रक्षा समझौता करने के बिल्कुल करीब पहुँच गया है।

क्या है इस सौदे के पीछे की कहानी?
दरअसल, यह पूरा मामला जंगी जहाजों और हथियारों की सप्लाई से जुड़ा है। सूत्रों की मानें तो पाकिस्तान अपने घरेलू स्तर पर बने 'JF-17 थंडर' फाइटर जेट्स को बेचने की तैयारी में है। यह डील पाकिस्तान के लिए इसलिए ज़रूरी है क्योंकि उसकी आर्थिक स्थिति फ़िलहाल नाजुक दौर से गुज़र रही है, और विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने के लिए रक्षा निर्यात (Defense Export) एक बड़ा सहारा बन सकता है।

सऊदी अरब का 'खास' कनेक्शन
इस डील में सबसे दिलचस्प मोड़ 'सऊदी अरब' का शामिल होना है। जानकार बता रहे हैं कि सऊदी अरब न सिर्फ इस सौदे में एक मददगार की भूमिका निभा रहा है, बल्कि वह इस क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण में एक बड़े खिलाड़ी के तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि मुस्लिम देशों के बीच रक्षा तालमेल बढ़ाने में सऊदी की कोशिशों का सीधा फ़ायदा पाकिस्तान को मिलने वाला है।

JF-17: गेम चेंजर या महज़ व्यापार?
पाकिस्तान अपने JF-17 लड़ाकू विमानों को एक किफायती विकल्प के तौर पर पेश करता रहा है। उनका तर्क है कि अगर कोई देश अमेरिकी या यूरोपीय विमान नहीं खरीद सकता, तो वह पाकिस्तानी-चीनी तकनीक से बने इन विमानों पर भरोसा कर सकता है। अगर यह 1.5 अरब डॉलर की डील फाइनल होती है, तो यह पाकिस्तान के अब तक के सबसे बड़े डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट्स में से एक होगा।

क्या चुनौतियां भी हैं?
बेशक! हथियारों का बाज़ार आसान नहीं होता। मेंटेनेंस, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता और विमान की वास्तविक युद्ध क्षमता को लेकर दुनिया भर के विशेषज्ञों के अलग-अलग मत हैं। फिर भी, पाकिस्तान की यह कोशिश दिखाती है कि वह अपनी रक्षा निर्माण क्षमता के दम पर ग्लोबल मार्केट में जगह बनाने के लिए पूरी तरह तैयार है।

अब देखना यह है कि क्या यह डील पाकिस्तान की खाली होती जेब में राहत की कुछ बूंदें डाल पाएगी या फिर अंतरराष्ट्रीय दबाव और प्रतियोगिता इस रास्ते को और मुश्किल बना देंगे।