फिर छिड़ी उत्तर बनाम दक्षिण की जंग, DMK सांसद के इस बयान पर मचा घमासान, BJP हुई आगबबूला
News India Live, Digital Desk : हमारे देश की राजनीति में आजकल एक बहुत ही खतरनाक ट्रेंड चल पड़ा है "उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत" (North vs South India) की बहस। जब भी लगता है कि मामला शांत हो गया है, तमिलनाडु से कोई न कोई नेता ऐसा बयान दे देता है जो जलती आग में घी का काम करता है।
इस बार फिर वही हुआ है। तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी डीएमके (DMK) के एक सांसद ने संसद या सार्वजनिक मंच पर कुछ ऐसा कह दिया है, जिससे एक बार फिर यह बहस छिड़ गई है कि क्या दक्षिण भारत के नेता उत्तर भारतीयों को 'अलग' नज़रिए से देखते हैं? इस बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने कड़ा एतराज जताया है और इसे देश को बांटने वाली मानसिकता बताया है।
आखिर मामला क्या है?
विवाद की जड़ अक्सर फंड (पैसा) और विचारधारा होती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, DMK सांसद ने अपने भाषण में उत्तर भारत के लोगों या वहां के राज्यों (जैसे यूपी, बिहार) के लिए कुछ ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया, जिसे अपमानजनक माना जा रहा है।
अक्सर दक्षिण के नेताओं का तर्क होता है कि टैक्स का ज्यादा पैसा दक्षिण भारत देता है, लेकिन विकास उत्तर भारत का होता है। लेकिन, इस बार मामला सिर्फ़ पैसे का नहीं, बल्कि 'सम्मान' का बन गया है। सांसद के बयान में भाषाई और सांस्कृतिक बंटवारे की झलक साफ़ दिखाई दे रही थी। उन्होंने उत्तर भारत की विचारधारा को दक्षिण से बिल्कुल अलग और पिछड़ा बताने की कोशिश की।
BJP का जोरदार पलटवार: "यह भारत तोड़ने की साजिश है"
जैसे ही यह वीडियो या बयान वायरल हुआ, बीजेपी के नेताओं ने डीएमके और इंडिया गठबंधन (I.N.D.I.A Alliance) को घेरना शुरू कर दिया। बीजेपी प्रवक्ताओं का कहना है कि यह "जुबान फिसलना" नहीं है, बल्कि यह एक सोची-समझी राजनीति है।
बीजेपी ने सवाल उठाया कि कांग्रेस और उनके सहयोगी दल बार-बार उत्तर भारतीयों, हिंदी भाषा और सनातन धर्म का अपमान क्यों करते हैं? उनका कहना है कि एक तरफ राहुल गांधी 'भारत जोड़ो' की बात करते हैं, और दूसरी तरफ उनके ही साथी दल 'भारत तोड़ो' जैसी बातें करते हैं। बीजेपी ने मांग की है कि इस बयान के लिए पार्टी को माफ़ी मांगनी चाहिए।
जनता क्या सोचती है?
सोशल मीडिया पर आम लोगों का गुस्सा भी सातवें आसमान पर है। लोग लिख रहे हैं कि हम चाहे तमिल बोलें या हिंदी, डोसा खाएं या परांठा हम सब भारतीय हैं। नेताओं को अपनी रोटियां सेंकने के लिए देश के टुकड़े करने वाली भाषा नहीं बोलनी चाहिए।
बार-बार क्यों होता है ऐसा?
राजनीतिक जानकारों (Political Experts) का मानना है कि तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से 'हिंदी विरोध' और 'द्रविड़ अस्मिता' पर टिकी रही है। चुनाव पास हों या चर्चा में आना हो, तो 'उत्तर बनाम दक्षिण' का मुद्दा सबसे आसान हथियार होता है। लेकिन 2026 के भारत में, जहाँ युवा एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं, वहां ऐसी "बांटने वाली राजनीति" अब चुभने लगी है।
हमारा नजरिया (Our Take)
मतभेद होना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन 'मनभेद' पैदा करना देश के लिए खतरा है। संविधान हमें 'हम भारत के लोग' कहता है, न कि 'हम उत्तर या दक्षिण के लोग'। उम्मीद है कि हमारे माननीय नेता अगली बार माइक पकड़ने से पहले यह बात जरूर याद रखेंगे।