भारत ने F-35 और सुखोई-57 को छोड़ राफेल को क्यों चुना? जानिए असली इनसाइड स्टोरी

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News India Live, Digital Desk : भारतीय रक्षा क्षेत्र में पिछले कुछ समय से एक ही सवाल सबसे ज्यादा गूंज रहा है आखिर भारतीय वायुसेना (IAF) दुनिया के सबसे आधुनिक माने जाने वाले अमेरिकी F-35 या रूसी सुखोई-57 (Su-57) जैसे स्टील्थ फाइटर्स को छोड़कर, फ्रांसीसी राफेल की तरफ दोबारा क्यों झुक रही है?

अक्सर जब हम फाइटर जेट्स की बात करते हैं, तो हमें लगता है कि जो जहाज रडार पर न दिखे (स्टीलथ), वही सबसे बेहतर है। कागज पर यह बात सही भी लगती है, लेकिन युद्ध के मैदान की हकीकत और देश की सामरिक जरूरतें (Strategic Needs) कुछ और ही इशारा करती हैं। आइए, साधारण भाषा में समझते हैं कि भारत का यह फैसला चीन को ध्यान में रखते हुए क्यों लिया गया है और इसके पीछे की स्मार्ट रणनीति क्या है।

1. "जाना-परखा दोस्त" नए अजनबी से बेहतर है
भारत के पास पहले से ही 36 राफेल मौजूद हैं, जो अंबाला और हाशिमारा एयरबेस पर तैनात हैं। भारतीय पायलट इन विमानों की नस-नस से वाकिफ हैं। अगर भारत अमेरिकी F-35 जैसा एकदम नया विमान खरीदता, तो उसके लिए पूरी ट्रेनिंग, मेंटेनेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर जीरो से शुरू करना पड़ता।

राफेल को दोबारा चुनने का मतलब है— 'लॉजिस्टिक्स' में आसानी। यानी एक ही तरह के विमान होने से उनकी मरम्मत और स्पेयर पार्ट्स का इंतजाम करना सस्ता और आसान होता है। वायुसेना के लिए अलग-अलग तरह के 'हाथियों' को पालने से बेहतर है, एक ही नस्ल के दमदार घोड़े रखना।

2. तकनीक पर कंट्रोल: अमेरिका की शर्तें बनाम फ्रांस का भरोसा
यह एक बहुत बड़ा कारण है जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं। अमेरिकी हथियार बेहतरीन होते हैं, इसमें कोई शक नहीं, लेकिन वो आते हैं ढेर सारी शर्तों के साथ। F-35 खरीदने का मतलब होता कि भारत का डेटा लिंक अमेरिकी सर्वर से जुड़ा रहता। आसान भाषा में कहें तो, हम अपने ही जहाज को कब और कहां उड़ा रहे हैं, इसकी खबर अमेरिका को रहती।

भारत जैसा स्वाभिमानी देश, अपनी सामरिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) से समझौता नहीं कर सकता। वहीं, फ्रांस के साथ भारत का रिश्ता ऐसा है कि वे तकनीक तो देते हैं, लेकिन उसे इस्तेमाल करने की पूरी आजादी भारत के पास होती है। वे कोई "की-कोड" (Key Code) अपने पास नहीं रखते।

3. चीन और 'टू-फ्रंट वॉर' की तैयारी
लद्दाख के ऊंचे पहाड़ों पर चीन का मुकाबला करने के लिए राफेल अपनी क्षमता साबित कर चुका है। राफेल "कोल्ड स्टार्ट" (तुरंत उड़ान भरने) में माहिर है और लद्दाख की ठंड और ऊंचाई में भी भारी हथियार लेकर उड़ सकता है।

चीन के पास J-20 स्टील्थ फाइटर है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि राफेल के रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और उसकी लंबी दूरी की 'मीटियोर' (Meteor) मिसाइलें चीन को हवा में ही धूल चटाने के लिए काफी हैं। भारत को अभी "दिखने वाला" लेकिन भरोसेमंद फाइटर चाहिए, न कि एक महंगा "अदृश्य" जहाज जिसे उड़ाने से पहले दस बार सोचना पड़े।

4. मेक इन इंडिया का भविष्य
भारत अब सिर्फ खरीददार नहीं बने रहना चाहता। राफेल मरीन (नेवी के लिए) और वायुसेना के लिए और राफेल की बात चल रही है, तो इसके पीछे "मेक इन इंडिया" का भी एक बड़ा एंगल है। फ्रांस भारत में इंजन तकनीक ट्रांसफर करने और यहीं मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए अमेरिका की तुलना में ज्यादा तैयार है।

रूस के सुखोई-57 की बात करें, तो रूस फिलहाल खुद युद्ध में उलझा है और उन पर लगे प्रतिबंधों के कारण स्पेयर पार्ट्स की सप्लाई और नए जेट्स की डिलीवरी पर भरोसा करना जोखिम भरा हो सकता है।