ईरान की सड़कों पर फिर गूंजा इंकलाब साहब, अब और नहीं, क्यों लोग कह रहे हैं मुल्ला देश छोड़ो?

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News India Live, Digital Desk: ईरान में विरोध प्रदर्शनों का इतिहास पुराना रहा है, लेकिन हाल के दिनों में जो माहौल बना है, उसने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। एक समय था जब लोग केवल छोटी-छोटी मांगों के लिए प्रदर्शन करते थे, लेकिन अब गुस्सा सीधे 'सिस्टम' के खिलाफ है। ईरान के आम नागरिक अब बिना किसी डर के वह नारे लगा रहे हैं, जो कुछ साल पहले तक सोच पाना भी नामुमकिन था।

आख़िर जनता इतनी नाराज़ क्यों है?
इस गुस्से के पीछे सिर्फ एक वजह नहीं, बल्कि कई साल का दबा हुआ गुबार है। ईरान में महंगाई सातवें आसमान पर है, बेरोज़गारी ने युवाओं की कमर तोड़ दी है और उस पर सरकार की सख्त पाबंदियाँ लोगों का दम घोंट रही हैं। जब घर चलाना मुश्किल हो जाए और उस पर भी 'नैतिकता' (Moral Policing) के नाम पर हर बात में टोका-टोकी की जाए, तो लोगों का धैर्य जवाब दे ही देता है।

'मुल्ला देश छोड़ो' नारे की हकीकत
आंदोलनकारियों का सीधा आरोप है कि धार्मिक नेतृत्व देश के संसाधनों का सही इस्तेमाल करने के बजाय अपनी विचारधारा थोपने में ज्यादा व्यस्त है। लोगों का कहना है कि मजहब के नाम पर जिस तरह के कानून थोपे जा रहे हैं, उनसे उनकी निजी आज़ादी और खुशियां खत्म हो रही हैं। इसीलिए अब नारा 'संशोधन' (Change) का नहीं बल्कि सीधे 'प्रस्थान' (Exit) का लग रहा है।

इंटरनेट पर पाबंदी और दमन की कोशिशें
ईरानी प्रशासन अक्सर इन प्रदर्शनों को विदेशी साजिश बताकर टालने की कोशिश करता है। जगह-जगह इंटरनेट बंद कर दिया जाता है और सड़कों पर भारी सुरक्षाबल तैनात होते हैं। लेकिन इस बार खास बात यह है कि युवा पीढ़ी हार मानने को तैयार नहीं दिख रही। स्कूल-कॉलेज के छात्र और कामकाजी महिलाएं इस प्रदर्शन में सबसे आगे हैं।

दुनिया की नज़रें ईरान पर
क्या यह प्रदर्शन किसी बड़े बदलाव या क्रांति की शुरुआत है? यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना तय है कि ईरान की सत्ता के सामने अब तक की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी है। दुनिया भर में फैले ईरानी नागरिक भी इस आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं और मानवाधिकारों की मांग तेज़ हो गई है।

यह कहानी केवल एक विरोध प्रदर्शन की नहीं, बल्कि उन इंसानी जज़्बों की है जो एक बेहतर और आजाद जिंदगी के लिए हर ज़ुल्म सहने को तैयार हैं।