वर्ल्ड इकॉनमी पर वर्ड्स वॉर? मैक्रों का ट्रंप पर सीधा हमला क्या टूट जाएगी इन दो बड़े नेताओं की दोस्ती?

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News India Live, Digital Desk: स्विट्ज़रलैंड का दावोस शहर अपनी ठंडक के लिए जाना जाता है, लेकिन 'वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम' (WEF) की मीटिंग में इस बार माहौल काफी गरम रहा। दुनिया के दो सबसे कद्दावर नेता—फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और अमेरिका के दोबारा चुने गए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच एक ऐसी वैचारिक टक्कर देखने को मिली है, जिसकी चर्चा हर जगह हो रही है। मैक्रों ने किसी कूटनीतिक दबाव की परवाह किए बिना सीधे तौर पर ट्रंप की नीतियों पर सवाल उठा दिए।

झगड़ा किस बात का है?
देखा जाए तो यह लड़ाई व्यक्तिगत नहीं, बल्कि 'सोच' की है। डोनाल्ड ट्रंप हमेशा 'अमेरिका फर्स्ट' (America First) की बात करते हैं। उनकी नीति साफ़ है अमेरिका के फायदे के लिए अगर व्यापारिक प्रतिबंध लगाने पड़ें या पुराने समझौतों से पीछे हटना पड़े, तो वो हिचकते नहीं हैं।

दूसरी तरफ इमैनुएल मैक्रों का मानना है कि दुनिया सिर्फ एक देश के स्वार्थ से नहीं चल सकती। मैक्रों ने दावोस के मंच से चेतावनी दी कि अगर हर देश सिर्फ अपनी तिजोरी भरने में लग गया, तो जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था सालों में बनी है, वो ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगी। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा कि ट्रंप की संरक्षणवादी (Protectionist) नीतियां यूरोप और बाकी दुनिया के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही हैं।

आंखों में आंखें डालकर दी नसीहत
आमतौर पर विदेशी मंचों पर नेता एक-दूसरे का नाम लेकर सीधे हमला करने से बचते हैं, लेकिन इस बार मैक्रों अलग मूड में थे। उन्होंने कहा कि व्यापार और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर 'अकेले चलना' किसी को महान नहीं बनाता। यह सीधे तौर पर ट्रंप के उन फैसलों पर वार था, जिनमें वे पर्यावरण समझौतों और ग्लोबल ट्रेड के नियमों को अपने हिसाब से मोड़ना चाहते हैं।

दुनिया पर क्या होगा इसका असर?
अब सवाल ये है कि फ्रांस और अमेरिका जैसे पुराने सहयोगियों के बीच की यह तल्खी हमें क्यों प्रभावित करती है? सच तो ये है कि जब ये दो बड़े देश टकराते हैं, तो इसका असर शेयर बाज़ार से लेकर ग्लोबल सप्लाई चेन तक हर चीज़ पर पड़ता है। अगर अमेरिका ने अपने ट्रेड रूल्स कड़े किए, तो सिर्फ फ्रांस ही नहीं, बल्कि भारत जैसे देशों के निर्यात (Export) पर भी इसका बोझ पड़ेगा।

कुल मिलाकर, दावोस में मैक्रों का ये आक्रामक अंदाज़ बता रहा है कि यूरोप अब ट्रंप के दबाव में रहने के मूड में नहीं है। आने वाले महीनों में देखना दिलचस्प होगा कि क्या ट्रंप अपने दोस्त मैक्रों की ये सलाह मानते हैं या फिर उनके 'अमरीका फर्स्ट' का जिन्न दुनिया की इकोनॉमी को एक नई मुसीबत में डाल देता है।