क्यों नहीं भरते मन के जख्म? इमोशनल हीलिंग में देरी पर खुद को न दें दोष, जानें इसके पीछे का विज्ञान
नई दिल्ली: किसी अपने का बिछड़ना हो, करियर की असफलता या फिर रिश्तों का टूटना—हम अक्सर उम्मीद करते हैं कि वक्त के साथ सब जल्दी ठीक हो जाएगा। हम खुद को 'दो हफ्ते' या 'छह महीने' जैसी समयसीमा में बांध लेते हैं, लेकिन जब भावनाएं पीछा नहीं छोड़तीं, तो हम खुद को ही अपराधी मानने लगते हैं। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि भावनात्मक उपचार (Emotional Healing) कोई सीधी लकीर नहीं है, बल्कि यह एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें उतार-चढ़ाव आना स्वाभाविक है।
मस्तिष्क का विज्ञान: क्यों यादें पीछा नहीं छोड़तीं?
विज्ञान के नजरिए से देखें तो हमारे मस्तिष्क का 'एमिग्डाला' हिस्सा, जो डर और भावनाओं को नियंत्रित करता है, किसी भी सदमे के बाद अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है। यह हिस्सा यादों को आसानी से नहीं भूलता। भले ही आप ऊपर से सामान्य दिखें, लेकिन मस्तिष्क के भावनात्मक मार्ग (Neural Pathways) सक्रिय रहते हैं। यही कारण है कि कोई पुराना गाना या शांत लम्हा अचानक आपको उसी पुराने दर्द में खींच ले जाता है। इसे 'धीमी रिकवरी' नहीं, बल्कि मस्तिष्क की 'प्रोसेसिंग' प्रक्रिया समझना चाहिए।
तेजी से उबरने की कोशिश बन सकती है 'जाल'
आज की 'इंस्टेंट' दुनिया में हम हर चीज का तुरंत समाधान चाहते हैं। हम सेल्फ-हेल्प किताबें पढ़ते हैं और जल्दी ठीक होने का दबाव खुद पर डालते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, हीलिंग में जल्दबाजी करना आपको आत्म-संदेह और शर्मिंदगी की ओर ले जा सकता है। हीलिंग शारीरिक घाव की तरह है, जिसे भरने के लिए अपने समय की जरूरत होती है। खुद से यह पूछने के बजाय कि "मैं अब तक उबर क्यों नहीं पाया?", यह पूछें कि "इस वक्त मेरी भावनाओं को किस सहारे की जरूरत है?"
नाम देने से कम होता है दर्द का असर
भावनात्मक संतुलन पाने का एक सरल लेकिन प्रभावी तरीका है 'भावनाओं का नामकरण'। जब भी उदासी या बेचैनी महसूस हो, तो उसे स्वीकार करें और कहें—"मुझे इस वक्त अकेलापन महसूस हो रहा है।" शोध बताते हैं कि भावनाओं को शब्द देने से मस्तिष्क का 'फियर सेंटर' शांत होता है। इसके साथ ही, छोटी लेकिन निरंतर आदतें जैसे—5 मिनट का आत्म-चिंतन या रोजाना की सैर, आपके तंत्रिका तंत्र (Nervous System) को सुरक्षित महसूस कराने में मदद करती हैं।
दर्द को खत्म नहीं, उसके साथ जीना सीखें
भावनात्मक उपचार का मतलब यह नहीं है कि आप उस दर्द को पूरी तरह भूल जाएं। इसका मतलब है उस अनुभव के साथ गरिमा के साथ जीना सीखना। 'आगे बढ़ जाने' (Moving On) के बजाय 'दर्द के साथ आगे बढ़ने' (Moving Forward) की मानसिकता अपनाएं। जब आप अपनी भावनाओं को बिना किसी आलोचना के स्वीकार करते हैं, तो आंतरिक संघर्ष कम होता है और हीलिंग की प्रक्रिया अधिक सहज और करुणामय हो जाती है।