ईवीएम और धांधली के आरोपों पर चुनाव आयोग की खरी-खरी ,समाजवादी पार्टी को आखिर क्यों दी ऐसी चेतावनी?
News India Live, Digital Desk: अक्सर कहा जाता है कि राजनीति में हार और जीत एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। लेकिन भारत में पिछले कुछ सालों से एक और चीज़ इस सिक्के का हिस्सा बन गई है वह है हार के बाद ईवीएम (EVM) या चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाना। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव अक्सर चुनाव परिणामों के बाद धांधली के आरोप लगाते रहे हैं।
लेकिन इस बार, भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने कुछ अलग अंदाज़ में उन्हें जवाब दिया है। आयोग ने उन्हें किसी कानून की किताब का हवाला देने के बजाय बचपन में सुनी हम सबकी पसंदीदा कहानी 'भेड़िया आया-भेड़िया आया' (The Boy Who Cried Wolf) याद दिलाई है।
आखिर चुनाव आयोग ने ऐसा क्यों कहा?
मामला दरअसल उन पुराने और नए आरोपों से जुड़ा है जिनमें अखिलेश यादव लगातार चुनाव मशीनरी की निष्पक्षता पर सवाल उठाते रहे हैं। आयोग का मानना है कि बार-बार बिना सबूतों के धांधली का शोर मचाने से जनता के मन में लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा होता है। आयोग ने साफ़ तौर पर याद दिलाया कि—"न तो तब (पुराने चुनावों में) कोई बेईमानी हुई थी और न ही अब हो रही है।"
भेड़िये वाली कहानी का मतलब क्या है?
आयोग ने इशारों-इशारों में जो बात कही, वह बहुत गहरी है। 'भेड़िया आया' वाली कहानी में एक लड़का बार-बार मज़क में शोर मचाता है कि भेड़िया आया, लेकिन जब सच में भेड़िया आता है, तो उसकी बात पर कोई यकीन नहीं करता। आयोग का संदेश साफ़ है: यदि विपक्षी नेता बिना किसी ठोस आधार के हर चुनाव के बाद धांधली का दावा करेंगे, तो कल को अगर वाकई में कहीं कोई कमी होगी, तब भी लोग उनकी बातों को गंभीरता से लेना छोड़ देंगे। इसे 'विश्वसनीयता का संकट' कहा जाता है।
ईवीएम पर खिंचती तकरार
8 जनवरी 2026 की ताज़ा परिस्थितियों को देखें तो समाजवादी पार्टी की तरफ से यह अक्सर तर्क दिया जाता रहा है कि उनकी शिकायतों पर सही ढंग से सुनवाई नहीं होती। वहीं चुनाव आयोग का पक्ष यह है कि वे पूरी तरह पारदर्शी हैं और हर बार इन आरोपों को तकनीकी और प्रशासनिक रूप से गलत साबित कर चुके हैं। आयोग की इस ताज़ा टिप्पणी ने अब इस विवाद को और भी चर्चा में ला दिया है।
आगे की राह: राजनीति बनाम सुचिता
एक जागरूक मतदाता के तौर पर हम जानते हैं कि लोकतंत्र में सवाल पूछना हक है, लेकिन क्या वे सवाल सिर्फ हार की खींच मिटाने के लिए होने चाहिए? आयोग का तंज इसी बात की ओर इशारा करता है कि राजनीतिक पार्टियों को अपनी हार का मंथन करने के लिए मशीन को निशाना बनाने के बजाय जनता के बीच अपने जुड़ाव पर गौर करना चाहिए।