ईरान के मुद्दे पर भारत ने क्यों चौंकाया? UN में पश्चिमी देशों के खिलाफ जाकर वोट करने की असली कहानी

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News India Live, Digital Desk: अक्सर दुनिया सोचती है कि बड़े अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भारत का रुख क्या होगा। ज्यादातर लोग अंदाजा लगाते हैं कि भारत या तो समर्थन करेगा या बीच का रास्ता (Abstain) अपनाएगा। लेकिन हाल ही में यूनाइटेड नेशंस (UN) में कुछ ऐसा हुआ, जिसने पश्चिमी देशों खासकर अमेरिका और यूरोप को हैरान कर दिया।

मसला था ईरान में मानवाधिकारों (Human Rights) की स्थिति का। पश्चिमी देशों ने ईरान को घेरने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया, लेकिन भारत ने इसके विरोध में अपना वोट डाल दिया। सीधे शब्दों में कहें तो, भारत ने इस प्रस्ताव को 'ना' कह दिया।

पश्चिमी देश हैरान क्यों हैं?
पश्चिमी देशों को उम्मीद थी कि मानवाधिकारों जैसे संवेदनशील मुद्दे पर शायद भारत उनका साथ देगा या कम से कम चुप रहेगा। लेकिन भारत के इस 'विपक्ष' वाले वोट ने एक कड़ा संदेश दिया है। कूटनीति के जानकारों का मानना है कि पश्चिमी देश इसे एक बड़े झटके के रूप में देख रहे हैं क्योंकि भारत अपनी 'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी' (स्वतंत्र नीति) को पूरी दुनिया के सामने मजबूती से रख रहा है।

भारत ने ऐसा फैसला क्यों लिया?
इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं। पहली तो यह कि ईरान और भारत के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से काफी पुराने और मजबूत हैं। चाहे वो ऊर्जा (तेल) का मामला हो या चाबहार पोर्ट जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स, भारत के लिए ईरान का साथ बहुत जरूरी है।

दूसरी बड़ी वजह यह है कि भारत हमेशा से ही इस बात का विरोध करता रहा है कि किसी देश के आंतरिक मामलों में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के जरिए हस्तक्षेप किया जाए। भारत का मानना है कि इस तरह के प्रस्ताव अक्सर किसी खास देश को निशाना बनाने के लिए राजनीति से प्रेरित होते हैं।

संदेश बिल्कुल साफ है
इस वोटिंग ने यह साफ कर दिया है कि नई दिल्ली की विदेश नीति अब वाशिंगटन या लंदन के दबाव में नहीं चलती। भारत अपने राष्ट्रीय हितों और अपने सहयोगियों के साथ खड़े होने की ताकत रखता है। यह फैसला उन लोगों के लिए एक जवाब है जो सोचते हैं कि भारत को किसी एक खेमे में बांधा जा सकता है।

फिलहाल, सोशल मीडिया से लेकर कूटनीतिक हलकों तक, हर तरफ इसी बात की चर्चा है कि कैसे एक 'नो' ने पश्चिम के बड़े-बड़े खिलाड़ियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।