पड़ोस में ये क्या पक रहा है? बांग्लादेशी जमात के साथ अमेरिकी डिप्लोमेट्स की गुपचुप मीटिंग ने बढ़ाई भारत की टेंशन

Post

News India Live, Digital Desk: पड़ोस में लगी आग की तपिश अक्सर अपने घर तक भी आती है। यही वजह है कि जब भी बांग्लादेश में कुछ हलचल होती है, तो भारत का सचेत होना स्वाभाविक है। लेकिन इस बार खबर थोड़ी ज्यादा गंभीर है। चर्चा है कि अमेरिकी राजनयिक (Diplomats) बांग्लादेश की कट्टरपंथी पार्टी 'जमात-ए-इस्लामी' के नेताओं के साथ नजदीकियां बढ़ा रहे हैं और उनसे मुलाकातों का दौर चल रहा है।

सवाल यह है कि जो देश लोकतंत्र की बात करता है, वह अचानक से एक कट्टरपंथी विचारधारा वाली पार्टी के प्रति इतना नरम क्यों पड़ रहा है? और भारत के लिए यह बात क्यों चिंता का विषय है?

2026 के चुनावों की बिसात
बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार के हटने के बाद से वहां के हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। अब निगाहें 2026 के आम चुनावों पर हैं। ऐसे में अमेरिका का 'जमात-ए-इस्लामी' के नेताओं से बात करना साफ़ संकेत दे रहा है कि वह भविष्य की राजनीति में उन्हें एक बड़ा प्लेयर मानकर चल रहा है।

अमरीकी दूतावास का कहना है कि वे सभी स्टेकहोल्डर्स (हितधारकों) से बात कर रहे हैं ताकि चुनाव निष्पक्ष हों। लेकिन 'जमात' का पुराना इतिहास और उनकी कट्टरपंथी सोच को देखते हुए यह तर्क हर किसी के गले नहीं उतर रहा।

भारत की 'सिरदर्दी' क्यों बढ़ी?
भारत और बांग्लादेश की सीमाएं हजारों किलोमीटर तक एक-दूसरे से जुड़ी हैं। 'जमात-ए-इस्लामी' को लेकर भारत का रुख हमेशा साफ रहा है—यह एक ऐसी जमात है जो भारत-विरोधी मानी जाती है और जिसके तार अक्सर कट्टरपंथी समूहों से जुड़े रहे हैं।

अगर बांग्लादेश की सत्ता में जमात का असर बढ़ता है, तो इससे भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में अस्थिरता का खतरा पैदा हो सकता है। बीते कुछ वर्षों में शेख हसीना की सरकार ने भारत की सुरक्षा चिंताओं का काफी ध्यान रखा था, लेकिन अब बदले हुए हालात दिल्ली के लिए एक नई चुनौती बन गए हैं।

एक नई कूटनीतिक उलझन
क्या अमेरिका और भारत के हित बांग्लादेश के मुद्दे पर अलग-अलग हैं? यह एक बड़ा सवाल है। एक तरफ भारत वहां स्थिरता और सुरक्षा चाहता है, तो दूसरी तरफ अमेरिका की रणनीति शायद कुछ और ही खिचड़ी पका रही है।

राजनीति के जानकारों का मानना है कि दक्षिण एशिया के इस हिस्से में बढ़ता अमेरिकी हस्तक्षेप न केवल बांग्लादेश, बल्कि पूरे क्षेत्र के समीकरण बिगाड़ सकता है। अब देखना यह है कि भारत इस बढ़ते प्रभाव और बदलती हुई हवा को रोकने के लिए अपनी कूटनीति के पिटारे से कौन सा रास्ता निकालता है।

फिलहाल तो यही लग रहा है कि 2026 की जंग सिर्फ ढाका के मैदानों में नहीं, बल्कि वाशिंगटन और दिल्ली की मेजों पर भी लड़ी जा रही है।