64 करोड़ का घोटाला तो बस झांकी ,खुलने लगी भष्ट्राचार की परते,मंत्री ने .....

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उत्तर प्रदेश वन निगम में 64 करोड़ 82 लाख रुपये की FD से जुड़े फर्जीवाड़े की जांच भले ही CBI कर रही हो, लेकिन निगम से लेकर शासन तक एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई है. कोई भी अधिकारी इस पर खुलकर बोलने को तैयार नहीं है. चर्चा है कि इस बड़े मामले पर लीपापोती के लिए एक कमेटी बनाई जा सकती है, लेकिन वन निगम का इतिहास बताता है कि ऐसी कमेटियां अक्सर फाइलों में ही दफन हो जाती हैं.

ऐसा ही कुछ पहले एक भ्रष्ट अफसर दविंदर सिंह के मामले में हुआ था. तब भी जांच के नाम पर खानापूर्ति होती रही और वो अफसर आराम से रिटायर हो गया. बाद में तत्कालीन अपर मुख्य सचिव के दखल के बाद उसके रिटायरमेंट के फायदे रोके गए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. उस मामले में बनी जांच कमेटी का आज तक कुछ अता-पता नहीं है.

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. जब निगम में इतना बड़ा वित्तीय घोटाला चल रहा है, तब एक और खेल पर्दे के पीछे खेला जा रहा है. यह खेल है निगम की यूनियन, उसके अध्यक्ष और प्रबंधन के बीच की कथित सांठगांठ का.

जिस पर है भ्रष्टाचार रोकने की जिम्मेदारी, वही प्रबंधन की गोद में?

किसी भी संस्थान में यूनियन की भूमिका मैनेजमेंट की मनमानियों पर रोक लगाने और कर्मचारियों के हक के लिए आवाज उठाने की होती है. लेकिन आरोप है कि वन निगम में यूनियन अध्यक्ष गौरव अमोली खुद भ्रष्ट प्रबंधन की टीम का एक अहम हिस्सा बन गए हैं. उन्हें साधने के लिए निगम के एमडी (प्रबंध निदेशक) अरविंद कुमार सिंह ने सारे नियम-कानून ताक पर रख दिए.

गौरव अमोली जो लिपिकीय संवर्ग में सिर्फ एक सहायक वर्ग-2 के बाबू हैं, उन्हें मेहरबानी करके विपणन अधिकारी (मार्केटिंग ऑफिसर) जैसे बड़े पद का चार्ज दे दिया गया. अंदरखाने चर्चा गर्म है कि यह सब इसलिए किया गया ताकि यूनियन निगम में फैले भ्रष्टाचार पर मुंह बंद रखे. सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि एमडी अरविंद कुमार सिंह अब यूनियन अध्यक्ष को इसी पद पर स्थायी (नियमित) कराने की तैयारी में हैं और इसके लिए एक "डील" भी फाइनल हो चुकी है.

जब इस मामले पर एमडी अरविंद कुमार सिंह से जानकारी लेने की कोशिश की गई तो उन्होंने रहस्यमयी चुप्पी साध ली. कोई भी जिम्मेदार अधिकारी यह बताने को तैयार नहीं है कि आखिर एक बाबू को इतने महत्वपूर्ण पद का चार्ज क्यों और कैसे दिया गया.

जब खुद यूनियन अध्यक्ष ने किया निगम के साथ फ्रॉड

गौरव अमोली पर मेहरबानी की वजह शायद उनका पुराना रिकॉर्ड भी हो सकता है. आरोप है कि यूनियन अध्यक्ष खुद निगम के साथ एक फ्रॉड कर चुके हैं.

उस समय यह मामला उठा तो जरूर था, लेकिन फिर इसे दबा दिया गया. अब सवाल यह उठता है कि जिस यूनियन अध्यक्ष पर खुद निगम को धोखा देने का आरोप है, जिस पर एमडी इतने मेहरबान हैं कि बाबू से अफसर बना रहे हैं, क्या वो 64 करोड़ के घोटाले पर कभी कोई सवाल करेगा? इस चुप्पी और मेहरबानी को देखकर तो यही लगता है कि वन निगम में भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं, जहां रक्षक ही भक्षक बने बैठे हैं.मंत्री से बात करने के लिए फ़ोन किया तो नहीं उठाया फ़ोन .