आस्था पर 'गैस संकट' की मार: देश के बड़े मंदिरों की रसोइयों पर लगा ताला, कहीं सौर ऊर्जा तो कहीं पारंपरिक चूल्हे बने सहारा

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नई दिल्ली/ब्यूरो: मिडिल ईस्ट के युद्ध और वैश्विक ऊर्जा संकट की आंच अब भारत के उन पवित्र द्वारों तक पहुँच गई है जहाँ कभी 'अन्नपूर्णा' का वास माना जाता था। देश के प्रमुख मंदिरों में प्रतिदिन लाखों श्रद्धालुओं की भूख मिटाने वाली रसोइयाँ (अन्नप्रसादम) अब एलपीजी (LPG) की किल्लत के कारण ठंडी पड़ रही हैं। दक्षिण के बेंगलुरु से लेकर पश्चिम के महाराष्ट्र तक, मंदिरों के पास या तो स्टॉक खत्म हो चुका है या वे पारंपरिक तरीकों की ओर लौटने को मजबूर हैं।

मंदिरों की रसोइयों का ताजा हाल: एक नज़र में

मंदिर का नामवर्तमान स्थितिआगामी रणनीति
बनशंकरी मंदिर (बेंगलुरु)अस्थायी रूप से बंद (11 मार्च से)आपूर्ति बहाल होने तक वितरण स्थगित।
साईं बाबा मंदिर (शिरडी)सुरक्षित (अगले 20 दिनों का स्टॉक)सौर ऊर्जा और 20 टन गैस का एडवांस स्टॉक।
विट्ठल रुक्मिणी (पंढरपुर)सुचारू (बैठकें जारी)कमी होने पर डीजल और लकड़ी के चूल्हों का उपयोग।
अम्बाबाई मंदिर (कोल्हापुर)संकट में (स्टॉल बंद होने की कगार पर)जिला प्रशासन द्वारा आपूर्ति रोकी गई।

दक्षिण भारत: बेंगलुरु के बनशंकरी मंदिर में मचा हाहाकार

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में स्थिति सबसे अधिक गंभीर है। प्रसिद्ध बनशंकरी मंदिर में 11 मार्च 2026 से निःशुल्क भोजन वितरण पूरी तरह रोक दिया गया है।

जरूरत: प्रतिदिन 5-6 कमर्शियल सिलेंडर।

उपलब्धता: मात्र 4 सिलेंडर (जो अब खत्म हो चुके हैं)।

श्रद्धालु इस स्थिति से काफी नाराज हैं और सरकार से मांग कर रहे हैं कि धार्मिक संस्थानों को 'प्राथमिकता' (Priority) श्रेणी में रखा जाए।

महाराष्ट्र: कहीं तैयारी तो कहीं लाचारी

शिरडी (साईं मंदिर): साईं संस्थान ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया है। यहाँ न केवल 20 टन गैस का बफर स्टॉक है, बल्कि सौर ऊर्जा परियोजना से रोजाना 200 किलोग्राम गैस की बचत की जा रही है। यहाँ अगले 20 दिनों तक भक्तों को कोई समस्या नहीं होगी।

पंढरपुर (विट्ठल रुक्मिणी): यहाँ प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि "श्रद्धालु भूखे नहीं रहेंगे"। अगर एलपीजी पूरी तरह बंद हुई, तो डीजल की जाली और पारंपरिक लकड़ी के चूल्हों पर खाना पकाने की तैयारी कर ली गई है।

कोल्हापुर (अम्बाबाई मंदिर): जिला प्रशासन द्वारा कमर्शियल गैस पर रोक लगाने से यहाँ के फूड स्टॉल मालिकों के पास केवल आज का स्टॉक बचा है। कल से यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को जलपान के लिए भी भटकना पड़ सकता है।

भक्तों की नाराजगी और वैकल्पिक मार्ग

श्रद्धालुओं का कहना है कि प्रशासन को मंदिरों की रसोइयों को आपातकालीन सेवाओं (अस्पताल की तरह) की श्रेणी में देखना चाहिए। कई जगहों पर अब भोजन की जगह फलों का वितरण शुरू किया गया है ताकि 'प्रसाद' की परंपरा टूटने न पाए।

विशेषज्ञों की राय: यह संकट इस बात की ओर इशारा करता है कि बड़े संस्थानों को अब एलपीजी जैसे जीवाश्म ईंधन के बजाय सौर ऊर्जा और बायोगैस जैसे विकल्पों पर स्थायी रूप से विचार करना होगा।

क्या आप अपने शहर के किसी विशिष्ट मंदिर की वर्तमान स्थिति या सरकार द्वारा मंदिरों के लिए जारी की गई नई 'सप्लाई गाइडलाइन्स' के बारे में जानना चाहेंगे?

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