शहर छोड़कर आखिर कहाँ चले गए लोग? यूपी की नई वोटर लिस्ट ने खोल दी बड़े संकट की पोल
News India Live, Digital Desk: जब भी चुनाव करीब आते हैं, तो अमूमन उम्मीद यही की जाती है कि वोटर लिस्ट में नए युवाओं के नाम जुड़ेंगे और वोटरों की संख्या बढ़ेगी। लेकिन उत्तर प्रदेश की ताजा मतदाता सूची (Voter List 2026) ने सबको चौंका दिया है। खासकर नोएडा, गाज़ियाबाद, लखनऊ और कानपुर जैसे बड़े शहरों में, जहाँ विकास के नाम पर आबादी दिन-दोगुनी बढ़नी चाहिए थी, वहां हजारों की संख्या में वोटरों के नाम कम हुए हैं।
अब सवाल यह उठता है कि क्या वाकई इन चमकते शहरों के प्रति लोगों का मोहभंग हो रहा है? या फिर इसकी जड़ें कहीं और गहरी छिपी हैं?
क्या छंटनी (Layoffs) बन रही है सबसे बड़ी वजह?
पिछले एक-डेढ़ साल से हम लगातार टेक कंपनियों और बड़े कॉरपोरेट हाउस से 'छंटनी' यानी ले-ऑफ की खबरें सुन रहे हैं। जिस इंसान ने ऊंचे सपनों के साथ लखनऊ या नोएडा जैसे शहरों में फ्लैट लिया था या किराए पर शिफ्ट हुआ था, नौकरी जाते ही उसके लिए वहां टिके रहना नामुमकिन हो गया।
दरअसल, जब बड़े शहरों में आय के स्रोत बंद होते हैं, तो सबसे पहली गाज घर और वहां के राशन-पानी पर गिरती है। बहुत बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपनी नौकरियां जाने के बाद दोबारा शहरों का रुख करने के बजाय अपने गांवों या छोटे शहरों (Reverse Migration) को सुरक्षित समझा। शायद यही वजह है कि वोटर लिस्ट में से उनका नाम 'स्थानांतरण' या 'निवास परिवर्तन' की वजह से हटा दिया गया है।
वो 'खौफ' क्या सच साबित हो रहा है?
अक्सर विशेषज्ञों ने चेताया था कि अगर बड़े शहरों में इसी तरह नौकरी का संकट रहा, तो वहां का इंफ्रास्ट्रक्चर दम तोड़ देगा। वोटर लिस्ट के आंकड़े इसी तरफ इशारा कर रहे हैं। गाज़ियाबाद और गौतमबुद्ध नगर जैसे 'इंडस्ट्रियल हब' से वोटरों का कम होना सीधे तौर पर मध्यम वर्ग की बेहाली बयां कर रहा है।
वोटर लिस्ट में नाम घटने का मतलब सिर्फ ये नहीं है कि लोग वोट नहीं देना चाहते; इसका सीधा मतलब ये है कि अब वो 'शहरी' रहे ही नहीं। जो भीड़ कभी शहरों की ताकत होती थी, अब वो दोबारा अपने पैतृक ठिकानों की ओर लौट रही है जहाँ ज़िंदगी महंगी भले न हो, लेकिन रहने की एक छत और अपना खेत है।
राजनीति पर इसका क्या होगा असर?
राजनीतिक दलों के लिए ये आंकड़े किसी बड़े खतरे की घंटी से कम नहीं हैं। शहरी वोटरों को जो पार्टियां अपनी 'जागीर' समझती थीं, अब उन्हें अपना एजेंडा बदलना पड़ेगा। अगर शहर खाली हो रहे हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि जनता के मुद्दे अब सिर्फ 'सड़क और बिजली' तक सीमित नहीं हैं, बल्कि 'स्थाई नौकरी और आर्थिक सुरक्षा' अब सबसे बड़े चुनावी मुद्दे बनने वाले हैं।