सच्चा प्यार या दिमागी तनाव? अगर आप भी पार्टनर से एक पल दूर नहीं रह सकते, तो संभल जाइए

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News India Live, Digital Desk: हम सब चाहते हैं कि हमारा कोई ऐसा साथी हो जो हमें समझे, हमें समय दे और जिससे हम अपने दिल की हर बात कह सकें। इसी जुड़ाव को हम 'इमोशनल बॉन्डिंग' कहते हैं। यह रिश्तों की बुनियाद है। लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है जब यह बॉन्डिंग धीरे-धीरे अटैचमेंट में बदल जाती है। ऐसी अटैचमेंट जिसमें आप सामने वाले के बिना खुद को 'अधूरा' मानने लगते हैं।

इमोशनल बॉन्डिंग और गहरे जुड़ाव में फर्क क्या है?
एक स्वस्थ रिश्ता वह है जहाँ दो लोग साथ होकर भी अपनी अलग पहचान रखते हैं। जहाँ आप एक-दूसरे को 'स्पेस' देते हैं। वहीं दूसरी ओर, 'एक्सेसिव अटैचमेंट' एक कैद की तरह होती है। यहाँ आप हर वक्त इस डर में रहते हैं कि कहीं सामने वाला आपको छोड़ न दे। आप उनके रिप्लाई का घंटों इंतज़ार करते हैं और अगर वे थोड़ा भी दूर जाएँ, तो आपको घबराहट होने लगती है।

मानसिक तनाव कैसे बढ़ता है?
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, जब हमारा खुश होना किसी और की छोटी-सी हरकत पर निर्भर करने लगता है, तो हमारा मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है।

  • असुरक्षा की भावना (Insecurity): हर वक्त पार्टनर का फोन चेक करना या उनसे सफाई मांगना आपको तनाव से भर देता है।
  • खुद की अनदेखी: इस चक्कर में आप अपने दोस्त, अपना काम और अपने शौक को भूल जाते हैं।
  • लो सेल्फ-कॉन्फिडेंस: आपको लगने लगता है कि आपके पास खुद की कोई खुशी नहीं है, जो है बस वही इंसान है।

संभलने की ज़रूरत कहाँ है?
अगर आपको महसूस हो रहा है कि आपके रिश्ते में अब वो सुकून नहीं रहा और आप हर छोटी बात पर उदास हो जाते हैं, तो समझ जाइए कि अब खुद पर काम करने का वक्त आ गया है। किसी भी रिश्ते में 'खूबसूरती' तब तक ही रहती है जब तक उसमें दोनों लोगों का अपना-अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व बना रहे।