बंगाल में फिर अटका पेंच आखिर क्यों UPSC ने लौटा दी ममता सरकार की भेजी हुई DGP नामों की लिस्ट?
News India Live, Digital Desk: पश्चिम बंगाल और केंद्र के बीच की खींचतान कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार मामला राज्य के सबसे बड़े पुलिस पद यानी डीजीपी (DGP) की कुर्सी को लेकर है। पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने अगले डीजीपी की नियुक्ति के लिए कुछ अफसरों के नामों की एक लिस्ट संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) को भेजी थी। लेकिन हुआ यह कि यूपीएससी ने उस लिस्ट को वापस कर दिया है।
अब सवाल ये उठता है कि आखिर इतनी बड़ी संवैधानिक संस्था ने लिस्ट लौटाई क्यों? क्या वाकई नियमों की अनदेखी हुई थी या फिर कहानी कुछ और है?
नियम और कागजों में कहां फंसा पेंच?
जानकारी के मुताबिक, यूपीएससी ने राज्य सरकार द्वारा भेजे गए प्रस्ताव में कुछ 'कमियां' पाई हैं। दरअसल, जब भी किसी राज्य में डीजीपी की नियुक्ति होती है, तो उसके लिए सुप्रीम कोर्ट और यूपीएससी के कुछ सख्त दिशा-निर्देश होते हैं।
बताया जा रहा है कि बंगाल सरकार ने जो लिस्ट भेजी थी, उसमें अधिकारियों के कार्यकाल, उनकी सीनियरिटी (वरिष्ठता) और जरूरी दस्तावेजों को लेकर कुछ तकनीकी दिक्कतें थीं। यूपीएससी का काम यह देखना होता है कि जो नाम भेजे गए हैं, क्या वे नियमानुसार सबसे ज्यादा योग्य हैं? इस बार की लिस्ट में शायद वो स्पष्टता नहीं थी जिसकी उम्मीद आयोग करता है।
सिर्फ कागजों की बात है या कुछ और?
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ममता सरकार चाहती है कि पुलिस की कमान ऐसे अधिकारी के हाथ में रहे जो राज्य की परिस्थितियों को बेहतर समझता हो (या शायद उनके 'करीब' हो)। वहीं, नियम यह कहते हैं कि रिटायरमेंट से कम से कम छह महीने पहले का कार्यकाल बचा होना चाहिए और अधिकारियों की सर्विस प्रोफाइल बिल्कुल साफ होनी चाहिए।
जब यूपीएससी ने फाइल वापस की, तो साथ में कुछ सवाल भी पूछे हैं। अब बंगाल सरकार को फिर से पूरी फाइल तैयार करनी होगी, जो यकीनन उनके लिए थोड़ा समय बर्बाद करने वाला और परेशानी बढ़ाने वाला काम है।
अब आगे क्या होगा?
जाहिर है, जब तक नई लिस्ट पर यूपीएससी अपनी मुहर नहीं लगा देता और तीन नामों का पैनल फाइनल नहीं कर देता, तब तक नए डीजीपी की परमानेंट नियुक्ति अधर में रहेगी। इससे न केवल प्रशासनिक स्तर पर सस्पेंस बना रहता है, बल्कि विपक्षी पार्टियों को भी सरकार पर सवाल उठाने का मौका मिल जाता है।
अब देखना ये होगा कि क्या ममता सरकार अगली बार नियमों के हिसाब से वही नाम भेजती है या फिर लिस्ट में कुछ बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे।
आप इस पूरे विवाद को कैसे देखते हैं? क्या राज्य सरकारों को अपना पुलिस चीफ चुनने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए? अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताएं।