सनस्क्रीन के डिब्बे पर लिखे SPF का सच, क्या वाकई आपकी क्रीम धूप से बचा रही है या बस पैसा बर्बाद हो रहा है?

Post

News India Live, Digital Desk: हम में से ज्यादातर लोग स्किन केयर के नाम पर एक अच्छी कंपनी का सनस्क्रीन खरीद लाते हैं और सोचते हैं कि अब हमारी त्वचा पूरी तरह सुरक्षित है। लेकिन कुछ ही दिनों बाद शिकायत शुरू हो जाती है कि "इतना महंगा सनस्क्रीन लगाया, फिर भी चेहरा टैन हो गया" या "त्वचा सांवली पड़ती जा रही है"।

अगर आपके साथ भी ऐसा हो रहा है, तो यकीन मानिए गलती सनस्क्रीन की नहीं, बल्कि उसे लगाने के तरीके की है। आज बात करेंगे उन्हीं छोटी लेकिन गंभीर गलतियों की, जिन्हें हम अक्सर अनजाने में कर बैठते हैं।

1. "कंजूसी" करना पड़ जाता है भारी
अक्सर हम सनस्क्रीन को आम फेयरनेस क्रीम या लोशन की तरह बहुत कम मात्रा में लगाते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि सनस्क्रीन की सुरक्षा तभी काम करती है जब उसे पर्याप्त मात्रा में लगाया जाए। यहाँ काम आता है 'टू फिंगर रूल' (Two-Finger Rule)। यानी आपकी इंडेक्स और मिडिल फिंगर पर जितनी सनस्क्रीन आए, उतनी मात्रा आपके चेहरे और गर्दन के लिए ज़रूरी है। उससे कम मात्रा लगाना न लगाने के बराबर है।

2. लगाकर तुरंत बाहर निकल जाना
क्या आप भी घर की दहलीज पार करने से ठीक एक मिनट पहले सनस्क्रीन लगाते हैं? अगर हाँ, तो यह तरीका गलत है। किसी भी केमिकल या फिजिकल सनस्क्रीन को त्वचा पर अपनी सुरक्षात्मक परत बनाने के लिए कम से कम 15 से 20 मिनट का समय चाहिए होता है। इसलिए, निकलने से आधा घंटा पहले ही इसे अप्लाई करें।

3. एक बार लगा लिया, बस काफी है?
यह सबसे बड़ी गलतफहमी है। कोई भी सनस्क्रीन 2 से 3 घंटे से ज्यादा सुरक्षा नहीं देता, खासकर तब जब आपको पसीना आ रहा हो या आप धूप में हों। अगर आप ऑफिस में हैं या बाहर हैं, तो हर 3 घंटे में इसे दोबारा लगाना (Re-apply) बहुत ज़रूरी है। सिर्फ सुबह एक बार लगा लेने से आप पूरे दिन की धूप से नहीं बच सकते।

4. सिर्फ SPF देख लेना ही काफी नहीं
अक्सर हम डिब्बे पर 'SPF 50' देखकर खुश हो जाते हैं, लेकिन हमें 'PA' रेटिंग पर भी गौर करना चाहिए। SPF हमें जलने (UVB) से बचाता है, लेकिन PA+ रेटिंग हमें त्वचा को काला करने वाली और झुर्रियां लाने वाली किरणों (UVA) से बचाती है। हमेशा ऐसा सनस्क्रीन चुनें जिसमें SPF के साथ कम से कम 'PA+++' मार्क हो।

5. घर के अंदर और बादलों वाले दिन लापरवाही
लोगों को लगता है कि अगर धूप नहीं खिली है या वे घर के अंदर हैं, तो सनस्क्रीन की क्या ज़रूरत? सच तो यह है कि बादलों के पीछे से भी अल्ट्रावॉयलेट किरणें हमारी स्किन तक पहुँचती हैं। यहाँ तक कि खिड़कियों से आने वाली रोशनी और मोबाइल/लैपटॉप की 'ब्लू लाइट' भी आपकी रंगत छीन सकती है। इसलिए, घर के अंदर रहना सनस्क्रीन न लगाने का बहाना नहीं हो सकता।