आसमान में बदल रही है कमान, सुनीता विलियम्स का वो जज्बा और भारत के शुभांशु का नया उड़ान

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News India Live, Digital Desk: बचपन में जब हम आसमान की ओर देखते थे, तो तारों के बीच किसी के होने का एहसास रोमांच भर देता था। उस रोमांच को नाम दिया सुनीता विलियम्स ने। सुनीता सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि भारत की करोड़ों बेटियों और युवाओं के लिए एक हौसला हैं। आजकल जब भी हम 'स्पेस स्टेशन' का नाम सुनते हैं, सुनीता विलियम्स की वो मुस्कुराती हुई तस्वीर आँखों के सामने आ जाती है। लेकिन आज की कहानी सिर्फ़ सुनीता की नहीं, बल्कि उस विरासत को आगे ले जाने वाले एक नए नायक की भी है।

सुनीता विलियम्स: एक अटूट संघर्ष की कहानी
आजकल सुनीता विलियम्स सुर्खियों में हैं, लेकिन किसी रिकॉर्ड के लिए नहीं, बल्कि अपनी जांबाजी के लिए। आपको पता ही होगा कि वो जिस स्टारलाइनर अंतरिक्ष यान से गई थीं, उसमें तकनीकी खराबी आ गई। जहां एक आम इंसान घबरा जाता, वहां सुनीता पिछले कई महीनों से अंतरिक्ष में डटी हुई हैं। वो वहीं से काम कर रही हैं, वहीं से रिसर्च कर रही हैं। यह उनके जज्बे को दिखाता है कि मुश्किलें कितनी भी बड़ी हों, एक अंतरिक्ष यात्री कभी हार नहीं मानता।

अब कमान संभालेंगे कैप्टन शुभांशु शुक्ला
लेकिन इसी बीच एक और शानदार खबर आई है जो हर हिंदुस्तानी का सीना गर्व से चौड़ा कर देगी। भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर शुभांशु शुक्ला अब इतिहास रचने के बेहद करीब हैं। नासा और इसरो (ISRO) के बीच एक खास समझौता हुआ है, जिसके तहत शुभांशु शुक्ला को इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) पर भेजा जा रहा है।

इसे आप एक तरह से 'पासिंग द बेटन' या कमान सौंपने जैसा समझ सकते हैं। एक तरफ सुनीता विलियम्स जैसे दिग्गज का अनुभव है, तो दूसरी तरफ शुभांशु शुक्ला जैसी नई ऊर्जा। शुभांशु वहां जाकर ना सिर्फ़ रिसर्च करेंगे, बल्कि भारत के 'गगनयान' मिशन के लिए ज़रूरी बारीकियों को भी सीखेंगे।

क्यों खास है ये सफर?
ये सिर्फ़ एक ट्रेनिंग या मिशन नहीं है। यह इस बात का सबूत है कि अब भारत अंतरिक्ष की रेस में सिर्फ़ पीछे चलने वाला नहीं, बल्कि अगुवाई करने वाला देश बन गया है। जब शुभांशु वहां पहुंचेंगे, तो अंतरिक्ष में भारत की मौजूदगी को एक नई मजबूती मिलेगी।

हैरानी की बात नहीं है कि सुनीता विलियम्स भी उन्हें देख कर उतनी ही खुश होंगी जितना कि हम। अंतरिक्ष में सरहदें नहीं होतीं, वहां सिर्फ़ 'मानवता' और 'विज्ञान' होता है।

सुनीता विलियम्स का वहां रुकना और शुभांशु का वहां पहुँचना, ये दोनों घटनाएं हमें सिखाती हैं कि आसमान छूने के लिए सिर्फ़ जहाज की ज़रूरत नहीं होती, इरादों की मजबूती भी ज़रूरी है। आने वाला समय भारतीय अंतरिक्ष प्रेमियों के लिए बेहद रोमांचक होने वाला है!