एक भाषण और दोस्ती खत्म? डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा को दिया बड़ा झटका, शांति मिशन से अचानक काटा नाम
News India Live, Digital Desk: पड़ोसी हो तो कनाडा और अमेरिका जैसा सालों से ये मिसाल दी जाती रही है। लेकिन जब बात डोनाल्ड ट्रंप की आती है, तो दोस्ती की परिभाषा रातों-रात बदल सकती है। ताजा मामला 'बोर्ड ऑफ पीस' (Board of Peace) को लेकर है, जहाँ से ट्रंप ने बड़ी बेरहमी के साथ कनाडा का न्योता वापस ले लिया है।
वजह? दावोस में दिया गया वो एक भाषण...
सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन कनाडा के दिग्गज नेता और पूर्व सेंट्रल बैंक गवर्नर मार्क कार्नी ने स्विट्जरलैंड के दावोस (World Economic Forum) में एक ऐसी स्पीच दे दी, जो ट्रंप और उनके करीबियों को नागवार गुजरी। कार्नी को कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो का बेहद करीबी माना जाता है। उन्होंने अपने भाषण में ट्रंप की कुछ नीतियों या उनकी विचारधारा को लेकर तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया था। बस, फिर क्या था ट्रंप की टीम ने फौरन रिएक्ट किया और कनाडा को इस अहम अंतरराष्ट्रीय ग्रुप से बाहर कर दिया।
क्या है ये 'Board of Peace'?
इसे ऐसे समझें कि यह ट्रंप का एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है, जिसका मकसद दुनिया भर में चल रहे युद्धों (जैसे रूस-यूक्रेन या मिडिल ईस्ट) में शांति बहाली के लिए एक मंच तैयार करना है। इसमें अमेरिका के कुछ सबसे खास सहयोगियों को शामिल होना था। कनाडा भी इसमें अहम भूमिका में था, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि ट्रूडो के लिए अमेरिका के साथ कदम से कदम मिलाना मुश्किल होता जा रहा है।
साफ मैसेज: 'ट्रंप को पसंद नहीं आलोचना'
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर दुनिया को ये संदेश दे दिया है कि ट्रंप के अगले कार्यकाल में 'ईमानदारी और वफादारी' (Loyalty) सबसे ऊपर होगी। ट्रंप की टीम ने शायद यह जताना चाहा है कि आप एक तरफ तो हमारे खिलाफ बड़े मंचों पर भाषण देंगे और दूसरी तरफ हमारे साथ बैठकर दुनिया में शांति स्थापित करने की बातें करेंगे—यह दोनों एक साथ नहीं चल सकते।
कनाडा के लिए क्या हैं इसके मायने?
कनाडा के लिए यह न सिर्फ एक डिप्लोमैटिक हार है, बल्कि आने वाले समय के लिए एक बड़ी चेतावनी भी है। ट्रेड, सुरक्षा और बॉर्डर से जुड़े मामलों पर कनाडा हमेशा अमेरिका पर निर्भर रहता है। ऐसे में 'बोर्ड ऑफ पीस' से बाहर होना महज शुरुआत हो सकती है। ट्रूडो प्रशासन के लिए अब चुनौती यह है कि वो अपने सलाहकारों (जैसे मार्क कार्नी) की बातों और अमेरिका के साथ बिगड़ते रिश्तों को कैसे संभालते हैं।
राजनीति की इस बिसात पर ट्रंप ने अपनी पहली चाल चल दी है। अब देखना ये है कि जस्टिन ट्रूडो इस पर क्या जवाब देते हैं।