मोदी सरकार vs तेलंगाना सरकार मनरेगा को बदलने वाले प्रस्ताव पर विधानसभा ने कह दिया साफ़ NO

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News India Live, Digital Desk :  मनरेगा (MGNREGA) सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की 'सांस' है। जब कहीं कोई काम नहीं मिलता, तब यही योजना गरीब की रसोई में चूल्हा जलाती है। लेकिन क्या यह पुरानी और भरोसेमंद योजना अब बदलने वाली है? खबर बड़ी है और सीधी आपकी जेब और गाँव की खुशहाली से जुड़ी है।

दक्षिण भारत के राज्य तेलंगाना से एक बड़ी खबर आई है। वहां की विधानसभा ने केंद्र सरकार के उस नए प्रस्तावित कानून के खिलाफ एक कड़ा प्रस्ताव (Resolution) पास कर दिया है, जो मनरेगा की जगह लेने वाला है।

आखिर यह नया 'बखेड़ा' क्या है?

तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने विधानसभा में बताया कि केंद्र सरकार मनरेगा को खत्म करके उसकी जगह एक नया कानून लाने की तैयारी कर रही है। इस नए एक्ट का नाम काफी भारी-भरकम है— "विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)"। सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन पेंच इसके नियमों में फंसा है।

रेवंत रेड्डी और उनकी सरकार का मानना है कि यह नया कानून दरअसल गरीबों और मजदूरों के हकों पर सीधा हमला है। आइए समझते हैं कि आखिर इस नए कानून में ऐसा क्या है जिस पर इतना बवाल मचा हुआ है।

3 बड़ी बातें जो आपको जाननी चाहिए:

  1. गांधी जी का नाम गायब: सबसे पहली आपत्ति यह जताई गई है कि नए एक्ट से "महात्मा गांधी" का नाम हटा दिया गया है। सीएम रेड्डी का कहना है कि यह सिर्फ नाम हटाना नहीं, बल्कि उस विचारधारा को खत्म करना है जिसने गरीब को काम का अधिकार दिया था।
  2. मजदूरों की 'छुट्टी' और किसानों का फायदा? नए प्रस्ताव में कहा गया है कि जब खेती का पीक सीजन (बुवाई-कटाई) होगा, तो लगभग 60 दिनों के लिए मनरेगा के तहत काम बंद रखा जाएगा। तर्क यह है कि इससे किसानों को खेतों के लिए मजदूर आसानी से मिल जाएंगे। लेकिन सवाल यह है— जिनके पास अपनी ज़मीन नहीं है, वो इन दो महीनों में क्या करेंगे? क्या वे सस्ते में काम करने को मजबूर नहीं होंगे? तेलंगाना सरकार का कहना है कि यह दलितों और भूमिहीनों के साथ अन्याय है।
  3. राज्यों पर खर्च का बोझ: अब तक मनरेगा का पूरा खर्चा लगभग केंद्र सरकार उठाती थी। लेकिन खबर है कि नए नियम के तहत 60:40 का फॉर्मूला लाया जा रहा है। यानी 40% पैसा अब राज्य सरकारों को देना होगा। रेवंत रेड्डी ने साफ कहा कि इससे राज्यों की कमर टूट जाएगी और वे विकास के दूसरे काम नहीं कर पाएंगे।

भाजपा का क्या कहना है?

सदन में मौजूद भाजपा विधायकों ने केंद्र का बचाव किया। उनका कहना था कि गाँव के किसान मजदूर न मिलने से परेशान हैं, और यह नया बदलाव खेती को बचाने और महात्मा गांधी के 'ग्राम स्वराज' के सपने को असल में लागू करने के लिए है।

अब आगे क्या?

फिलहाल, तेलंगाना विधानसभा ने सर्वसम्मति (कुछ विरोध के बीच) से प्रस्ताव पास कर दिया है कि वे इस नए एक्ट को लागू नहीं होने देंगे। यह लड़ाई अब सिर्फ एक राज्य की नहीं रही, बल्कि यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या रोजगार की गारंटी का पुराना मॉडल बदला जाना चाहिए या नहीं?

यह मुद्दा गरीब मजदूर की थाली और राज्यों के अधिकार, दोनों से जुड़ा है। देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र सरकार राज्यों के इस विरोध पर क्या प्रतिक्रिया देती है।