येमेन की ज़मीन पर अब अपनों के ही दांव-पेच,क्या अरब की दो सबसे बड़ी ताकतों के बीच बढ़ने वाली है कड़वाहट?
News India Live, Digital Desk: मिडल ईस्ट (Middle East) यानी मध्य पूर्व की राजनीति में कब दोस्त दुश्मन बन जाएं और कब पुरानी दुश्मनी ठंडी पड़ जाए, यह समझना आसान नहीं है। यमन, जो पिछले कई सालों से युद्ध और भुखमरी की मार झेल रहा है, आज एक ऐसी उलझन में फंसा है जहाँ दुश्मन से ज्यादा 'अपनों' की रणनीतियां एक-दूसरे को काट रही हैं। जिस यमन के लिए सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने कभी हाथ मिलाया था, आज वही देश इन दोनों ताकतों के बीच खींचतान का नया मैदान बन गया है।
गठबंधन में पड़ गई दरार?
कहानी शुरू हुई थी हूतियों (Houthis) के खिलाफ एक एकजुट मोर्चे के साथ। शुरुआत में सऊदी अरब और यूएई एक ही लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रहे थे। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, दोनों देशों के हित (Interests) बदलने लगे। जानकार बताते हैं कि सऊदी अरब की प्राथमिकता हमेशा से अपनी सरहद की सुरक्षा रही है, ताकि हूतियों के मिसाइल हमले रुक सकें। वहीं, यूएई की नज़र यमन के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बंदरगाहों और समुद्री रास्तों (Maritime Routes) पर है।
जमीन पर अलग-अलग समर्थन का खेल
यमन के भीतर यह तल्खी साफ़ देखी जा सकती है। एक तरफ सऊदी अरब यमन की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन कर रहा है, तो दूसरी तरफ यूएई 'दक्षिणी संक्रमणकालीन परिषद' (STC) यानी अलगाववादियों को मजबूती दे रहा है। नतीजा यह है कि यमन की ज़मीन पर एक नहीं, बल्कि कई छोटी-छोटी लड़ाइयां एक साथ चल रही हैं। जब दो बड़े भाई एक ही घर में अलग-अलग समूहों को खाद-पानी देंगे, तो जाहिर है कि घर कभी शांत नहीं होगा।
मुस्लिम देशों के बीच नेतृत्व की होड़?
यह विवाद सिर्फ एक छोटे से देश के वर्चस्व का नहीं है, बल्कि मुस्लिम जगत में 'सबसे बड़े खिलाड़ी' (Major Player) बनने की दौड़ का भी हिस्सा है। यूएई आज एक आर्थिक महाशक्ति के साथ-साथ एक स्वतंत्र सैन्य और कूटनीतिक पहचान बनाना चाहता है, जो हमेशा सऊदी अरब के साए में रहकर संभव नहीं था। दूसरी तरफ, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्व में सऊदी अरब अपनी 'विजन 2030' को सफल बनाने के लिए क्षेत्र में शांति चाहता है, लेकिन वह यमन पर अपनी पकड़ ढीली करने को तैयार नहीं है।
किसका नुकसान, किसका फायदा?
सऊदी अरब और यूएई के बीच बढ़ती यह कूटनीतिक ठंडक पूरे अरब क्षेत्र के लिए एक नई चिंता का विषय है। अगर ये दोनों ताकतें आपस में उलझती हैं, तो इसका सबसे ज्यादा फायदा हूतियों को और उनके जरिए ईरान को मिल सकता है। लेकिन इस पूरी 'ग्रैंड शतरंज' की बिसात पर अगर किसी की जान सबसे सस्ती है, तो वो है यमन की जनता। वो जनता, जो सालों से इस उम्मीद में बैठी है कि कभी तो बाहर से आने वाले गोलों और मिसाइलों की आवाज बंद होगी।
फिलहाल, यमन की स्थिति एक ऐसी 'अघोषित युद्ध' की ओर बढ़ रही है, जहाँ दोस्त ही एक-दूसरे की राह का कांटा बनते दिख रहे हैं। आने वाले वक्त में दिल्ली से लेकर वाशिंगटन तक की निगाहें इस पर टिकी होंगी कि क्या रियाद और अबू धाबी अपने मतभेदों को सुलझा पाते हैं या नहीं।