खालिदा जिया कभी हाउसवाइफ थीं, फिर बनीं बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री ,संघर्षों से भरी वो अनकही कहानी
News India Live, Digital Desk : जब भी हम दक्षिण एशिया की शक्तिशाली महिलाओं की बात करते हैं, तो बांग्लादेश की राजनीति का जिक्र 'खालिदा जिया' के बिना अधूरा रह जाता है। आज उनके निधन की खबर ने ढाका से लेकर दिल्ली तक एक अलग तरह की सुगबुगाहट पैदा कर दी है। जो लोग बांग्लादेश की अंदरूनी राजनीति को जानते हैं, उन्हें पता है कि खालिदा जिया केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री नहीं थीं, बल्कि वे संघर्ष का एक जीता-जाता उदाहरण थीं।
घर की दहलीज से देश की बागडोर तक
खालिदा जिया की कहानी बहुत फिल्मी और नाटकीय रही है। साल 1945 में जन्मी खालिदा शुरू में एक साधारण गृहिणी (housewife) थीं। उन्होंने अपनी पूरी दुनिया अपने पति ज़ियाउर रहमान (बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति) के साथ बसा रखी थी। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। 1981 में जब उनके पति की हत्या हुई, तब बांग्लादेश की गलियों में सन्नाटा था। उसी सन्नाटे को तोड़ने के लिए खालिदा जिया को बाहर निकलना पड़ा। उन्होंने न केवल अपने पति की विरासत को संभाला, बल्कि 'बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी' (BNP) को उस मुकाम पर पहुँचाया जहाँ उसकी अनदेखी नामुमकिन थी।
'दो बेगमों की लड़ाई' का एक प्रमुख हिस्सा
बांग्लादेश के राजनीतिक गलियारों में 'बैटल ऑफ बेगम्स' (दो बेगमों की जंग) का किस्सा हर किसी की जुबां पर रहता था। एक तरफ थीं शेख हसीना और दूसरी तरफ खालिदा जिया। इन दोनों महिलाओं ने मिलकर पहले तो लोकतंत्र के लिए लंबी लड़ाई लड़ी, लेकिन बाद में ये दोनों एक-दूसरे की धुर विरोधी बन गईं। खालिदा जिया 1991 में बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं, और इसके बाद कई मौकों पर सत्ता की कुर्सी संभाली। उनके दौर में बांग्लादेश ने कई बड़े बदलाव देखे।
चुनौतियां और कानूनी अड़चनें
सत्ता के शीर्ष पर रहना उनके लिए कभी आसान नहीं रहा। उनके राजनीतिक सफर का पिछला एक दशक काफी दर्दनाक रहा। करप्शन के मामलों में सजा, जेल की सलाखें और फिर गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की वजह से लंबे समय तक हाउस अरेस्ट। उनके समर्थकों ने इसे हमेशा 'सियासी रंजिश' बताया, तो विरोधियों ने इसे न्याय। पिछले कई सालों से उनकी तबीयत नासाज चल रही थी, लेकिन उनकी शख्सियत ऐसी थी कि अस्पताल में होने के बावजूद वे राजनीति की चर्चा का मुख्य बिंदु बनी रहती थीं।
एक सशक्त पहचान की विदाई
आज खालिदा जिया भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन बांग्लादेश के इतिहास में उनका नाम एक ऐसी महिला के रूप में दर्ज रहेगा जिसने पुरुषों के वर्चस्व वाली राजनीति में न सिर्फ अपनी जगह बनाई, बल्कि देश के भविष्य की दिशा भी तय की। उन्होंने अपने समर्थकों के लिए 'मां' (मदर ऑफ डेमोक्रेसी) और विरोधियों के लिए एक 'कठिन चुनौती' की छवि छोड़ी है।