पूजा का तरीका अलग हो सकता है, लेकिन जड़ें नहीं ,मोहन भागवत ने झारखंड में साधा सांस्कृतिक समीकरण
News India Live, Digital Desk : झारखंड की राजनीति और समाज में अक्सर एक सवाल गूंजता रहता है क्या आदिवासी हिंदू हैं, या उनकी अपनी अलग पहचान है? इस मुद्दे पर सियासी रोटियां भी खूब सेंकी जाती हैं और बहस भी लंबी चलती है। लेकिन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने हाल ही में झारखंड में जो कहा, उसने इस पूरी चर्चा को एक नई दिशा दे दी है। उनकी बातें सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि उस गहरे जुड़ाव की याद दिलाती हैं जो सदियों से भारत की माटी में बसा है।
हम दो नहीं, एक ही डाली के फूल हैं
लोहरदगा में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने बहुत ही सहज और अपनेपन भरे अंदाज में आदिवासी समाज से संवाद किया। उन्होंने साफ लफ्जों में कहा कि 'आदिवासी और हिंदू अलग नहीं हैं'। अक्सर लोग कहते हैं कि आदिवासियों का रहन-सहन, खान-पान या पूजा करने का तरीका अलग है। इस पर भागवत जी ने जो तर्क दिया, वह सोचने पर मजबूर करता है।
उनका कहना था कि विविधता ही भारत की पहचान है। किसी के भगवान को मानने का तरीका अलग हो सकता है, कोई मूर्ति पूजता है तो कोई प्रकृति (पेड़-पहाड़), लेकिन हमारी जो मूल जड़ें हैं, हमारे पूर्वज हैं, और हमारा जो 'जीवन दर्शन' है—वह पूरी तरह से एक ही है।
"बहकाने वालों से सावधान रहें"
मोहन भागवत ने इशारों-इशारों में एक बड़ी चेतावनी भी दी। उन्होंने आदिवासी भाई-बहनों को सचेत किया कि समाज में कुछ ऐसी ताकतें सक्रिय हैं जो हमें बांटने की कोशिश करती हैं। ये लोग आकर कहते हैं, "तुम अलग हो, हम अलग हैं," और इसी तरह दूरियां पैदा की जाती हैं।
संघ प्रमुख ने संदेश दिया कि हमें इस 'अलग होने' के भ्रम जाल में नहीं फंसना है। आदिवासी संस्कृति भारत की मूल संस्कृति का ही अटूट हिस्सा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि गर्व से कहो कि हम भारतीय हैं और हमारी संस्कृति महान है।
झारखंड के लिए इसके मायने
झारखंड, जिसे वनों और जनजातियों की धरती कहा जाता है, वहां संघ प्रमुख का यह दौरा और यह संदेश बहुत खास माना जा रहा है। यहां धर्मांतरण और 'सरना कोड' जैसे मुद्दों पर अक्सर गरमागर्मी रहती है। ऐसे माहौल में भागवत का यह कहना कि 'सब एक हैं', सामाजिक समरसता को मजबूत करने की कोशिश है।
कुल मिलाकर, संदेश साफ है समाज को बांटकर नहीं, बल्कि जड़ों से जुड़कर ही आगे बढ़ा जा सकता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उनके इस 'एकता के मंत्र' को आदिवासी समाज और आलोचक किस नजरिए से देखते हैं।