"पत्नी छोड़कर चली गई, तो क्या मेरी लिव-इन पार्टनर पेंशन की हकदार नहीं?" - दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले ने छेड़ी नई बहस
Delhi HC On Pension and Gratuity: शादी, तलाक, और रिश्ते... समाज और कानून की किताबों में इन शब्दों के मतलब बहुत साफ हैं। लेकिन जब कोई रिश्ता इन परिभाषाओं के बीच कहीं उलझ जाए, तो क्या होता है? एक ऐसा ही मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा, जिसने अब एक नई और बहुत बड़ी बहस छेड़ दी है - "क्या सरकारी कर्मचारी की लिव-इन पार्टनर भी फैमिली पेंशन की हकदार हो सकती है?"
क्या है यह पूरा मामला? (एक कर्मचारी की कहानी)
यह कहानी एक सरकारी कर्मचारी की है, जिसकी जिंदगी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं:
- एक कर्मचारी की पत्नी, बिना तलाक दिए ही उसे छोड़कर चली जाती है।
- 1983 में, वह एक दूसरी महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहना शुरू कर देता है। इस रिश्ते से उनके दो बच्चे भी होते हैं।
- वह अपने इस नए रिश्ते को कभी नहीं छुपाता, बल्कि अपनी लिव-इन पार्टनर और बच्चों को परिवार का दर्जा दिलाने की कोशिश करता है।
- लेकिन, डिपार्टमेंट में उस पर अपनी पहली पत्नी और बेटी की 'उपेक्षा' करने का आरोप लगता है और उसकी सैलरी काट ली जाती है।
- 2011 में, रिटायरमेंट से ठीक पहले, उस पर अपने बच्चों का पासपोर्ट बनवाते समय गलत जानकारी देने का आरोप लगता है और उसकी 50% पेंशन और ग्रेच्युटी हमेशा के लिए रोक दी जाती है।
अब, सालों की लड़ाई के बाद, यह मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा, जहां कोर्ट ने एक ऐतिहासिक टिप्पणी की।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि जब कर्मचारी ने कभी भी अपने रिश्ते को नहीं छिपाया और हमेशा अपनी पार्टनर और बच्चों को परिवार का हिस्सा माना, तो उसे सिर्फ इस आधार पर उसकी रिटायरमेंट के फायदों से वंचित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा:
- कर्मचारी की 50% पेंशन और ग्रेच्युटी को रोकना गलत है।
- उसे उसकी पूरी रोकी हुई रकम 6% ब्याज के साथ वापस की जाए।
और सबसे बड़ी बात…
हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी कहा कि वह इस मामले पर विचार करे कि क्या उस कर्मचारी की लिव-इन पार्टनर और बच्चों को फैमिली पेंशन और सरकारी हेल्थ सुविधाएं (CGHS) दी जा सकती हैं।
तो अब आगे क्या होगा?
इस मामले में आखिरी फैसला अब केंद्र सरकार को लेना है। लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट के इस निर्देश ने एक बड़ा दरवाजा खोल दिया है। यह सवाल अब सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों का बन गया है जो भारत में लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं।
अगर सरकार इस पर कोई सकारात्मक फैसला लेती है, तो यह भारत के पारिवारिक कानूनों में एक क्रांतिकारी बदलाव होगा, जो लिव-इन रिश्तों को एक नई कानूनी और सामाजिक पहचान देगा।