Hindu Funeral Rites : अंतिम संस्कार में क्यों तोड़ा जाता है मिट्टी का घड़ा? जानें इसके पीछे का गहरा रहस्य और नियम
News India Live, Digital Desk: हिंदू रीति-रिवाजों में जन्म से लेकर मृत्यु तक 16 संस्कारों का वर्णन है। अंत्येष्टि संस्कार अंतिम है। चिता को अग्नि देने से पहले मृतक का मुख्य उत्तराधिकारी (पुत्र या अन्य) पानी से भरा मिट्टी का घड़ा लेकर शव की परिक्रमा करता है और अंत में उसे पटक कर तोड़ देता है। यह देखने में भले ही एक सामान्य प्रक्रिया लगे, लेकिन इसके मायने बहुत गहरे हैं।
1. जीवन की नश्वरता का प्रतीक (Symbol of Mortality)
शास्त्रों के अनुसार, हमारा शरीर मिट्टी का बना है। मिट्टी के घड़े को मानव शरीर का प्रतीक माना गया है।
घड़े का फूटना: जैसे घड़ा फूटने के बाद उसकी मिट्टी वापस मिट्टी में मिल जाती है, वैसे ही यह रस्म दर्शाती है कि मृत्यु के बाद यह पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बना शरीर वापस उन्हीं तत्वों में विलीन हो गया है।
दार्शनिक संदेश: यह रस्म जीवित परिजनों को यह संदेश देती है कि जिस शरीर से उन्हें मोह था, वह अब केवल एक खाली बर्तन की तरह है जिसका अस्तित्व समाप्त हो चुका है।
2. मोह-भंग करना (Breaking the Bond)
माना जाता है कि मृत्यु के बाद भी आत्मा का अपने परिवार और शरीर के प्रति मोह बना रहता है। वह आसानी से शरीर छोड़ना नहीं चाहती।
परिक्रमा और छेद: घड़े में छेद कर पानी गिराते हुए परिक्रमा करना यह दर्शाता है कि जीवन की आयु का पानी धीरे-धीरे खत्म हो गया है।
घड़ा तोड़ना: घड़ा तोड़ने का अर्थ है कि अब आत्मा का इस नश्वर संसार और शरीर से रिश्ता पूरी तरह टूट चुका है। यह आत्मा को शांति प्रदान करने और उसे अगले सफर (परलोक) की ओर बढ़ने के लिए संकेत देने की एक प्रक्रिया है।
3. 'कपाल क्रिया' से संबंध
मिट्टी का घड़ा तोड़ने की प्रक्रिया का एक हिस्सा 'कपाल क्रिया' की तैयारी भी होता है। शास्त्रों में माना गया है कि मनुष्य की प्राण ऊर्जा कपाल (सिर) से बाहर निकलनी चाहिए ताकि उसे सद्गति मिले। घड़ा तोड़ना इस क्रिया का एक प्रतीकात्मक आरंभ है, जो भौतिक जगत के अंत की घोषणा करता है।
अंतिम संस्कार के कुछ अन्य महत्वपूर्ण नियम
सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार: हिंदू धर्म में आमतौर पर सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार वर्जित है। माना जाता है कि रात में यम के द्वार बंद हो जाते हैं और आत्मा को कष्ट होता है।
स्त्रियों का श्मशान जाना: प्राचीन काल में इसे वर्जित माना जाता था, लेकिन आधुनिक समय में भावनात्मक और सामाजिक बदलावों के कारण महिलाएं भी अंतिम विदाई में शामिल हो रही हैं।
सूतिका/सूतक काल: मृत्यु के बाद घर में 13 दिनों का सूतक काल रखा जाता है, जो अशुद्धि निवारण और शोक व्यक्त करने का समय होता है