Maha Shivratri 2026 : आखिर महादेव के माथे पर कैसे विराजे चंद्रमा? राजा दक्ष का वो भयानक श्राप और शिव की असीम कृपा
News India Live, Digital Desk: महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव की महिमा का उत्सव है। आपने हमेशा महादेव की तस्वीरों में उनके मस्तक पर अर्धचंद्र (आधा चांद) विराजित देखा होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि चंद्रमा वहां तक कैसे पहुंचे? इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प पौराणिक कथा है, जो राजा दक्ष के एक श्राप और महादेव की दयालुता से जुड़ी है।
1. राजा दक्ष का वो 'जानलेवा' श्राप
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चंद्रमा का विवाह राजा दक्ष की 27 पुत्रियों (27 नक्षत्रों) के साथ हुआ था।
पक्षपात का आरोप: चंद्रमा अपनी सभी पत्नियों में से रोहिणी को सबसे ज्यादा प्रेम करते थे। बाकी 26 बहनों ने इसकी शिकायत अपने पिता राजा दक्ष से की।
श्राप की अग्नि: राजा दक्ष ने चंद्रमा को कई बार समझाया, लेकिन जब वे नहीं माने तो क्रोध में आकर दक्ष ने चंद्रमा को 'क्षय रोग' (Tuberculosis) से ग्रस्त होने का श्राप दे दिया। इस श्राप के कारण चंद्रमा की चमक कम होने लगी और वे धीरे-धीरे खत्म होने के कगार पर पहुंच गए।
2. महादेव की शरण और चंद्रदेव की तपस्या
जब चंद्रमा का अस्तित्व खतरे में पड़ गया, तब ब्रह्मा जी की सलाह पर उन्होंने भगवान शिव की कठिन तपस्या की। चंद्रमा ने प्रभास क्षेत्र (वर्तमान में सोमनाथ) में शिवलिंग की स्थापना कर 'महामृत्युंजय मंत्र' का जाप किया।
असंभव को संभव बनाना: महादेव चंद्रदेव की भक्ति से प्रसन्न हुए, लेकिन दक्ष का श्राप पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता था।
शिव का समाधान: महादेव ने चंद्रमा की रक्षा के लिए उन्हें अपने मस्तक पर धारण कर लिया। इससे चंद्रमा को पुनर्जीवन मिला और वे श्राप के प्रभाव से मुक्त होकर फिर से चमकने लगे।
3. पूर्णिमा और अमावस्या का रहस्य
भगवान शिव की कृपा से ही चंद्रमा का घटना और बढ़ना शुरू हुआ।
15-15 दिन का चक्र: श्राप के प्रभाव से चंद्रमा 15 दिन घटते हैं (कृष्ण पक्ष) और शिव के वरदान से 15 दिन बढ़ते हैं (शुक्ल पक्ष)।
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग: चंद्रमा ने जहाँ तपस्या की थी, वहीं प्रथम ज्योतिर्लिंग 'सोमनाथ' के रूप में स्थापित हुआ। 'सोम' का अर्थ है चंद्रमा और 'नाथ' का अर्थ है उनके स्वामी यानी शिव।
4. महाशिवरात्रि पर इस कथा का महत्व
महाशिवरात्रि के दिन इस कथा को सुनने या पढ़ने से मन को शांति मिलती है और जातक के जीवन से नकारात्मकता दूर होती है। यह कथा हमें सिखाती है कि जब दुनिया साथ छोड़ दे, तब महादेव की शरण ही एकमात्र सहारा होती है।