दोस्ती या चाल? ट्रंप खरीदना चाहते हैं ग्रीनलैंड और उधर रूस मना रहा है जश्न, समझिये अंदर की असली बात

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News India Live, Digital Desk: डोनल्ड ट्रंप जब भी कुछ बोलते हैं, तो वो सुर्खियां बन ही जाता है। एक बार फिर चर्चा गरम है कि ट्रंप ग्रीनलैंड को खरीदने के अपने पुराने शौक को हकीकत में बदलना चाहते हैं। ग्रीनलैंड, जो दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है और फिलहाल डेनमार्क के अधिकार क्षेत्र में आता है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि ट्रंप के इस प्लान से उनके विरोधी देश यानी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के चेहरे पर रौनक आ गई है।

पुतिन की खुशी के पीछे क्या राज है?
देखा जाए तो अमेरिका और रूस हमेशा से आमने-सामने रहे हैं, फिर पुतिन क्यों चाहेंगे कि अमेरिका और बड़ा हो जाए? इसका जवाब छुपा है 'दरार' में। ट्रंप जैसे ही ग्रीनलैंड को खरीदने की बात छेड़ते हैं, डेनमार्क और यूरोपीय देश भड़क जाते हैं। पुतिन जानते हैं कि अगर ट्रंप अपनी जिद पर अड़े रहे, तो इससे अमेरिका और उसके यूरोपीय साथियों (EU) के बीच तनाव पैदा होगा। यूरोप का नाराज होना मतलब नाटो (NATO) का कमजोर होना, और यही पुतिन चाहते हैं।

आर्कटिक की 'सुपरपावर' जंग
एक और बड़ी वजह है 'आर्कटिक क्षेत्र' पर कब्जा। ग्रीनलैंड ऐसी जगह पर है जहाँ से पूरे आर्कटिक सागर पर नजर रखी जा सकती है। रूस पहले से ही यहाँ अपनी ताकत बढ़ा रहा है। पुतिन को लगता है कि अगर अमेरिका इस इलाके में जमीन खरीदने जैसी पंगेबाजी में उलझा रहेगा, तो रूस को अपना दबदबा और पुख्ता करने का मौका मिलेगा। पुतिन का मानना है कि ट्रंप के ऐसे फैसले पश्चिमी देशों की एकता को कमजोर करते हैं।

क्या डेनमार्क बेचेगा अपना आइलैंड?
सच तो यह है कि डेनमार्क पहले ही साफ मना कर चुका है कि "ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है।" लेकिन ट्रंप अपनी जिद के लिए मशहूर हैं। जानकारों का कहना है कि पुतिन सिर्फ किनारे बैठकर मजे ले रहे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि इस एक सौदे के चक्कर में अमेरिका के अपने ही पुराने दोस्तों के साथ रिश्ते बिगड़ सकते हैं।

कुल मिलाकर, पुतिन का खुश होना किसी गहरी रणनीतिक चाल से कम नहीं है। जहाँ ट्रंप इसे एक रियल एस्टेट डील मान रहे हैं, वहीं पुतिन इसे 'बाँटो और राज करो' के सुनहरे मौके की तरह देख रहे हैं। अब देखना ये होगा कि व्हाइट हाउस में अपनी अगली पारी में ट्रंप इस पर कितना जोर लगाते हैं।