ट्रंप के पीस बोर्ड से कुछ देशों ने बनाई दूरी, पर क्या भारत थामेगा अमेरिका का हाथ? जानिये पूरी सच्चाई
News India Live, Digital Desk: आज के समय में रूस और यूक्रेन के बीच खिंची तलवारें सिर्फ दो देशों का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का सिरदर्द बनी हुई हैं। डोनल्ड ट्रंप, जिन्होंने चुनाव के दौरान बार-बार वादा किया था कि वे इस जंग को तुरंत रुकवा देंगे, अब अपने एक्शन मोड में नजर आ रहे हैं। इसी कड़ी में उन्होंने एक 'बोर्ड ऑफ पीस' बनाने का विचार रखा है, जिसमें दुनिया के कुछ प्रभावशाली नेताओं को शामिल करने की योजना है।
भारत के लिए क्यों है यह खास?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत इसमें शामिल होगा? सच तो यह है कि दुनिया का कोई भी बड़ा देश अब यह मानने लगा है कि बिना भारत के किसी भी बड़े वैश्विक मसले का हल नहीं निकल सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबंध व्लादिमीर पुतिन से भी अच्छे हैं और पश्चिमी देशों से भी। ट्रंप जानते हैं कि अगर भारत इस टेबल पर बैठता है, तो रूस को बातचीत के लिए राजी करना काफी आसान हो जाएगा।
कुछ देशों ने क्यों कहा 'ना'?
लेकिन कहानी इतनी भी सीधी नहीं है। खबर है कि कुछ यूरोपीय देशों ने ट्रंप के इस न्योते को लेकर थोड़ी बेरुखी दिखाई है। इन देशों को लगता है कि ट्रंप शायद यूक्रेन की शर्तों के बजाय अपनी शर्तों पर समझौता कराना चाहते हैं। कई नाटो (NATO) सहयोगियों को डर है कि कहीं ट्रंप इस चक्कर में रूस को बहुत ज्यादा ढील न दे दें। इसीलिए, जहां कुछ देश इसे 'शानदार कदम' मान रहे हैं, वहीं कुछ इसे शक की निगाह से देख रहे हैं।
भारत का रुख: दोस्ती भी और दस्तूर भी
भारत हमेशा से 'गुटनिरपेक्षता' की राह पर चला है। पीएम मोदी ने पहले ही कह दिया है कि "यह युद्ध का युग नहीं है।" भारत का झुकाव शांति की तरफ तो है, लेकिन वह किसी भी ऐसे बोर्ड का हिस्सा सोच-समझकर ही बनेगा जहाँ उसकी स्वायत्तता (Autonomy) बरकरार रहे। ट्रंप का यह ऑफर भारत के लिए अपनी ग्लोबल धाक दिखाने का बड़ा मौका भी हो सकता है और एक कूटनीतिक चुनौती भी।
फिलहाल, विदेश मंत्रालय ने इस पर अपने पत्ते नहीं खोले हैं। लेकिन इतना तो तय है कि अगर ट्रंप की इस 'पीस टीम' में मोदी का नाम शामिल होता है, तो भारत की 'विश्वमित्र' वाली छवि और भी मजबूत होगी।