इसे सिर्फ मेला न समझें, यह है मिनी कुंभ जानिए क्या होता है कल्पवास जिसके नियम हिला देते हैं
News India Live, Digital Desk: जनवरी का महीना यानी कड़ाके की ठंड। रजाई से निकलने का मन नहीं करता, लेकिन उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (Prayagraj) में नज़ारा कुछ और ही होता है। यहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर एक ऐसा शहर बस जाता है जो सिर्फ एक महीने के लिए ही होता है। इसे हम 'माघ मेला' कहते हैं, जिसे दुनिया 'मिनी कुंभ' (Mini Kumbh) के नाम से भी जानती है।
लेकिन क्या आपको पता है कि यहाँ लाखों लोग सिर्फ नहाने नहीं आते, बल्कि एक महीने के लिए अपना घर-बार छोड़कर यहीं रेत पर बस जाते हैं? इस कठिन व्रत को 'कल्पवास' (Kalpwas) कहते हैं।
आखिर क्या है यह कल्पवास?
आसान भाषा में कहें तो 'कल्प' का मतलब है एक लंबा समय और 'वास' का मतलब रहना। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माघ के महीने में जो व्यक्ति संगम किनारे कुटिया बनाकर रहता है और संयम से जीवन बिताता है, उसे पिछले जन्मों के पापों से मुक्ति मिल जाती है। कहा जाता है कि इस दौरान देवता भी अपना रूप बदलकर संगम में स्नान करने आते हैं।
लेकिन दोस्तों, कल्पवासी बनना बच्चों का खेल नहीं है। यह एक कड़ी परीक्षा है।
वो नियम जो रूह कंपा दें
जो लोग कल्पवास का संकल्प लेते हैं, उनकी दिनचर्या सुनकर ही आपको ठंड लगने लगेगी:
- ब्रह्म मुहूर्त में स्नान: कल्पवासियों को सूरज उगने से पहले उठना होता है और उस ठंडे बर्फीले पानी में गंगा स्नान करना होता है।
- ज़मीन पर सोना: चाहे ठंड कितनी भी हो, वे गद्देदार बिस्तरों पर नहीं, बल्कि रेत पर फूस या दरी बिछाकर सोते हैं।
- सिर्फ एक बार भोजन: पूरे दिन में सिर्फ एक ही बार खाना खाया जाता है, वह भी एकदम सात्विक (बिना प्याज-लहसुन का)। वे अपनी भूख और इंद्रियों पर काबू पाते हैं।
- सत्संग और भजन: बाकी पूरा समय वे भजन-कीर्तन और संतों की वाणी सुनने में बिताते हैं। दुनियादारी, फोन और सोशल मीडिया से दूरी बना ली जाती है।
तुलसी के पौधे का साथी
आपने देखा होगा कि कल्पवासियों के तंबू (Tent) के बाहर जौ (Barley) और तुलसी का पौधा जरूर लगा होता है। कल्पवास की शुरुआत तुलसी लगाने से होती है और समाप्ति पर उस तुलसी को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है। यह प्रकृति के साथ जुड़ने का एक तरीका है।
धैर्य की परीक्षा (Patience)
असल में, कल्पवास सिर्फ पूजा-पाठ नहीं है। यह इंसान को धैर्य (Patience) और अहिंसा सिखाने का एक ट्रेनिंग कोर्स है। यहाँ लोग सीखते हैं कि कम से कम सुविधाओं में भी खुश कैसे रहा जा सकता है। आपसी लड़ाई-झगड़ा या किसी की बुराई करना यहाँ सख्त मना होता है।
तो अगली बार जब आप टीवी पर माघ मेले की भीड़ देखें, तो याद रखिएगा कि वो सिर्फ भीड़ नहीं है, बल्कि वो ऐसे तपस्वियों का समूह है जो अपनी रूह को शुद्ध करने के लिए सर्दी, भूख और कष्ट सब हंसते-हंसते झेल रहे हैं। यही हमारी सनातन परंपरा की खूबसूरती है।