धीरेंद्र शास्त्री और टेस्ट मैच वाला वो बयान छत्तीसगढ़ में जब छिड़ी आसाराम की चर्चा
News India Live, Digital Desk : आज के दौर में पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री अपनी बेबाकी और अनोखे अंदाज़ के लिए जाने जाते हैं। छत्तीसगढ़ की पावन धरती पर एक कार्यक्रम के दौरान जब माहौल जमा था, तो उनके सामने एक ऐसा सवाल आया जिसकी चर्चा अक्सर कतरा कर की जाती है। किसी ने उनसे सीधे-सीधे 'आसाराम' (Asaram) के बारे में उनकी राय पूछ ली।
बाबा बागेश्वर, जो अक्सर मुश्किल सवालों का जवाब भी चुटकी लेकर देते हैं, इस बार गंभीर हुए। लेकिन उनके जवाब देने का तरीका वही पुराना बिल्कुल देसी और सटीक रहा।
टेस्ट मैच और ज़िंदगी का वो अनोखा मेल
पंडित धीरेंद्र शास्त्री ने आसाराम के मुद्दे पर सीधा हाँ या ना में उलझने के बजाय, क्रिकेट की पिच का सहारा लिया। उन्होंने कहा, "देखिए, ज़िंदगी एक टेस्ट मैच की तरह होती है और इसमें एक सिद्धांत काम करता है। टेस्ट मैच में हर किसी को अपनी पारी खेलनी पड़ती है, और टिकना भी पड़ता है।"
शास्त्री जी का इशारा साफ़ था। उन्होंने समझाया कि क्रिकेट के टेस्ट मैच की तरह यहाँ भी धैर्य की परीक्षा होती है। आप कितनी भी अच्छी शुरुआत क्यों न करें, लेकिन अगर आप क्रीज पर टिक नहीं पाए या आपसे कोई चूक हुई, तो आप 'आउट' मान लिए जाते हैं। उन्होंने इस उदाहरण के जरिए यह संकेत दिया कि किसी भी व्यक्ति का कर्म (Karma) और समय, दोनों ही उसकी पारी का फैसला करते हैं।
सिर्फ लोकप्रियता काफी नहीं है...
बाबा बागेश्वर ने बातों-बातों में यह भी समझाया कि धर्म और अध्यात्म के रास्ते पर चलना 'शॉर्टकट' वाला गेम नहीं है। यहाँ सिर्फ तेज़ रन बनाना (लोकप्रियता पाना) बड़ी बात नहीं है, बल्कि मर्यादा के नियमों के साथ क्रीज पर लंबे समय तक खड़ा रहना ही असली परीक्षा है। छत्तीसगढ़ के उस पंडाल में बैठे हजारों श्रद्धालु उनके इस दार्शनिक अंदाज़ को सुनकर शांत रह गए।
जवाब के पीछे की गहराई
धीरेंद्र शास्त्री के इस बयान के अब अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं। कोई कह रहा है कि उन्होंने किसी का बचाव नहीं किया, बल्कि कर्मों के सिद्धांत को याद दिलाया। तो कोई कह रहा है कि उनका इशारा साफ़ था कि जब आप 'मैच' (जिंदगी) खेल रहे होते हैं, तो नियम और अंपायर (ईश्वर/कानून) का फैसला ही आखिरी होता है।
कुल मिलाकर, पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने एक बार फिर यह साबित किया कि वे जटिल से जटिल विषयों पर भी अपनी राय रखने का हौसला रखते हैं, भले ही उनका लहजा सांकेतिक (Metaphorical) क्यों न हो। छत्तीसगढ़ के लोगों के लिए बाबा का यह 'क्रिकेट वाला सबक' लंबे समय तक याद रहेगा।