AI से लिखा फैसला? सुप्रीम कोर्ट ने जताई कड़ी आपत्ति ,जज के शॉर्टकट पर कही ये बड़ी बात

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News India Live, Digital Desk: यह मामला तब सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में यह बात आई कि एक निचली अदालत के जज ने अपने फैसले के तर्क और भाषा को तैयार करने के लिए AI टूल की मदद ली थी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि न्याय देना एक मानवीय और विवेकपूर्ण कार्य है, जिसे मशीन के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

1. सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? (The Verdict on AI)

जस्टिस की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए कुछ कड़े ऑब्जर्वेशन दिए:

न्यायिक विवेक की कमी: कोर्ट ने कहा कि AI फैसले तो दे सकता है लेकिन वह 'न्याय' नहीं कर सकता। फैसले में जज का अपना विवेक (Judicial Mind) दिखना चाहिए, न कि किसी एल्गोरिदम का आउटपुट।

गोपनीयता और डेटा का खतरा: जजों को चेतावनी दी गई कि AI टूल्स का उपयोग करने से संवेदनशील कानूनी डेटा और पक्षकारों की गोपनीयता भंग हो सकती है।

पक्षपात का डर: सुप्रीम कोर्ट ने आगाह किया कि AI मॉडल अक्सर पक्षपाती (Biased) डेटा पर आधारित होते हैं, जो निष्पक्ष न्याय के सिद्धांत के खिलाफ जा सकता है।

2. मामला क्या था?

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह विवाद एक जमानत (Bail) याचिका या आदेश से शुरू हुआ था, जिसमें जज ने वैश्विक स्तर पर AI द्वारा दी गई कानूनी दलीलों का हवाला देते हुए फैसला सुनाया था। जब मामला ऊपरी अदालत में पहुंचा, तो फैसले की शब्दावली और तर्कों के पैटर्न से यह स्पष्ट हो गया कि इसमें तकनीकी सहायता ली गई है।

3. क्या जज कानूनी शोध (Legal Research) के लिए AI का उपयोग कर सकते हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने तकनीक के इस्तेमाल को पूरी तरह खारिज नहीं किया है, लेकिन कुछ सीमाएं तय की हैं:

शोध तक सीमित: जज केस लॉ (पुराने फैसलों) को खोजने या अनुवाद के लिए AI की मदद ले सकते हैं।

फैसला खुद लिखें: कोर्ट ने साफ किया कि 'तर्क' (Reasoning) और 'निष्कर्ष' (Conclusion) पूरी तरह जज के अपने होने चाहिए। किसी भी स्थिति में फैसला 'कॉपी-पेस्ट' नहीं होना चाहिए।

4. भविष्य की चुनौती

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने पहले भी अदालतों के डिजिटलीकरण का समर्थन किया है, लेकिन इस ताजा मामले ने 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' बनाम 'ह्यूमन इंटेलिजेंस' की बहस को नया मोड़ दे दिया है। दुनिया भर की अदालतों में भी इस पर नियम बनाने की कोशिशें चल रही हैं।