राजस्थान बीजेपी में बड़ा बदलाव नई टीम, नई जिम्मेदारी जानिये अब आपके जिले की कमान किसके हाथ में है
News India Live, Digital Desk : राजस्थान की राजनीति में अगर आप रुचि रखते हैं, तो आपको पता होगा कि सत्ता (सरकार) और संगठन (पार्टी) गाड़ी के दो पहियों की तरह होते हैं। भजनलाल सरकार तो अपना काम कर रही है, लेकिन पार्टी संगठन में सुस्ती न आए, इसके लिए अब बीजेपी ने एक बड़ा 'गियर' बदल दिया है।
जयपुर से एक बड़ी खबर सामने आई है। राजस्थान बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ (Madan Rathore) के निर्देश पर प्रदेश के अलग-अलग जिलों के 'जिला प्रभारियों' (District In-charges) की नियुक्ति की गई है। इस नई लिस्ट ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है।
आइये, बिल्कुल आसान और देसी भाषा में समझते हैं कि ये बदलाव क्यों किए गए हैं और एक 'जिला प्रभारी' का काम क्या होता है।
आखिर क्या है बीजेपी का प्लान?
दोस्तों, हम सब जानते हैं कि विधानसभा चुनाव हो चुके हैं और लोकसभा भी। तो अब अचानक ये नियुक्तियां क्यों? दरअसल, असली लड़ाई अब 'जमीन' की है। आने वाले समय में प्रदेश में स्थानीय निकाय (Local Body) और पंचायत चुनाव होने वाले हैं।
पार्टी को लगता है कि अगर गाँव और शहर की छोटी-छोटी इकाइयों में पकड़ मजबूत रखनी है, तो हर जिले पर निगरानी रखने के लिए एक 'प्रभारी' का होना बहुत जरूरी है।
जिला प्रभारी आखिर करते क्या हैं?
इसे आप ऐसे समझिये कि प्रभारी उस जिले का 'हेडमास्टर' या 'कोच' होता है।
- समन्वय (Coordination): स्थानीय विधायकों, सांसदों और कार्यकर्ताओं के बीच अगर कोई झगड़ा या मनमुटाव है, तो उसे सुलझाना।
- रिपोर्टिंग: जिले में पार्टी का काम कैसा चल रहा है, इसकी रिपोर्ट सीधे प्रदेश अध्यक्ष और जयपुर मुख्यालय को देना।
- एक्टिव मोड: यह देखना कि सरकार की योजनाएं जनता तक पहुँच रही हैं या नहीं और विपक्ष को कैसे घेरना है।
लिस्ट में किसे मिली जगह?
इस बार की लिस्ट में बीजेपी ने एक स्मार्ट चाल चली है। इसमें अनुभवी नेताओं के साथ-साथ तेज-तर्रार चेहरों को भी मौका दिया गया है।
- कई सांसदों और विधायकों को भी दूसरे जिलों की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
- पार्टी के पुराने और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को प्रभार दिया गया है ताकि असंतोष न पनपे।
- जातीय समीकरण (Caste Equations) को साधने की भी पूरी कोशिश की गई है।
उदाहरण के लिए, अगर कोई नेता जयपुर का रहने वाला है और संगठन में अच्छी पकड़ रखता है, तो उसे सीकर या अलवर जैसे पड़ोसी जिले का प्रभार दिया गया है ताकि वो वहां पूरा समय दे सके।
सरकार और संगठन में तालमेल
अक्सर देखा जाता है कि जब पार्टी सत्ता में आती है, तो कार्यकर्ता यह शिकायत करते हैं कि "हमारी सुनी नहीं जा रही"। नए प्रभारियों का सबसे बड़ा टास्क यही होगा कि वो कार्यकर्ताओं की बात सरकार तक पहुंचाएं और संगठन में जोश भरकर रखें।
आगे क्या?
दोस्तों, ये नियुक्तियां बता रही हैं कि बीजेपी रिलैक्स मूड में नहीं है। भजनलाल सरकार के काम और संगठन की मेहनत—दोनों को मिलाकर पार्टी अगले 5 साल तक अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देना चाहती।
अब आपको बस यह पता करना है कि आपके जिले का नया 'बॉस' कौन बना है? क्योंकि आने वाले दिनों में आपके इलाके की राजनीतिक गतिविधियों की डोर उन्हीं के हाथ में होगी।