इंसान की पहचान उसकी भाषा या जात नहीं मोहन भागवत ने नए साल पर समाज को क्यों दिया ये बड़ा संदेश

Post

News India Live, Digital Desk : आज 1 जनवरी, 2026 की पहली सुबह है। हम सब नए साल के संकल्प ले रहे हैं, कोई फिटनेस की बात कर रहा है तो कोई करियर की। लेकिन इसी बीच छत्तीसगढ़ की धरती से एक ऐसी बात सामने आई है जो हमारे समाज की बुनियाद से जुड़ी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में अपने संबोधन में कुछ ऐसी बातें कही हैं, जो आज के समय में हम सबके लिए समझना बेहद ज़रूरी है।

हम कहाँ भटक रहे हैं?

मोहन भागवत ने बहुत ही सरल शब्दों में एक कड़वा सच सामने रखा। उन्होंने कहा कि हम अक्सर लोगों को उनके बोलने के अंदाज़, उनकी भाषा या उस जाति से तौलने लगते हैं जिसमें वे पैदा हुए हैं। लेकिन हकीकत क्या है? क्या एक इंसान की काबिलियत या उसकी इंसानियत उसकी भाषा से तय होती है? संघ प्रमुख का मानना है कि ये जो 'भेदभाव' की दीवारें हमने अपने चारों ओर खड़ी कर ली हैं, यही हमारे पिछड़ेपन की सबसे बड़ी वजह हैं।

छत्तीसगढ़ की गोद में सामाजिक एकता का मंत्र

छत्तीसगढ़ अपने शांत स्वभाव और आदिवासी संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहीं से भागवत ने यह संदेश दिया कि विविधता हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने साफ़ किया कि चाहे कोई उत्तर से हो या दक्षिण से, कोई हिन्दी बोलता हो या कोई और क्षेत्रीय भाषा—हम सबके रगों में एक ही गौरवशाली संस्कृति का खून बहता है।

'भेदभाव छोड़ो, देश जोड़ो' वाला अंदाज़

अक्सर राजनीति में जात-पात की बातें बहुत होती हैं, लेकिन भागवत का इशारा उस 'सामाजिक समरसता' की ओर था जहाँ हर इंसान दूसरे को बराबर की नज़र से देखे। उन्होंने याद दिलाया कि जब हम साथ चलते हैं, तो मुश्किलें आसान हो जाती हैं। पुराने ज़माने की जो रूढ़ियाँ या जो ऊंच-नीच की भावनाएं चली आ रही हैं, उन्हें अब इतिहास के कूड़ेदान में डाल देने का वक्त आ गया है।

आज यानी 1 जनवरी 2026 को जब हम नए भारत की बात करते हैं, तो वह भारत सिर्फ़ सड़कों और बिल्डिंगों से नहीं बनेगा, बल्कि हमारे और आपके व्यवहार से बनेगा। मोहन भागवत का यह बयान सिर्फ़ एक 'न्यूज़ हेडलाइन' नहीं है, बल्कि यह एक आईना है। हम सबको खुद से पूछना चाहिए कि क्या हम सच में किसी को जज (judge) करने से पहले उसके गुणों को देखते हैं?

समाज तभी मजबूत होता है जब उसकी जड़ें यानी हम और आप—भेदभाव से मुक्त हों। चलिए, 2026 की शुरुआत इसी खूबसूरत सोच के साथ करते हैं कि अब पहचान 'भाषा' या 'जाति' नहीं, बल्कि एक 'भारतीय' के तौर पर होगी।