ब्रिक्स में पाकिस्तान को नहीं आने देगा भारत', पाकिस्तानी एक्सपर्ट का बड़ा कबूलनामा- पहले अपने गिरेबान में झांकने की सख्त जरूरत
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में इस समय एक ऐसी चर्चा ने जोर पकड़ लिया है जो पाकिस्तान के रणनीतिकारों और नीति निर्माताओं की नींद उड़ाए हुए है। दुनिया के उभरते हुए सबसे बड़े और प्रभावशाली आर्थिक मंच 'ब्रिक्स' (BRICS) में शामिल होने की पाकिस्तान की तमाम उम्मीदों पर भारत की मजबूत कूटनीतिक दीवार ने पानी फेर दिया है। खुद पाकिस्तान के ही कई जाने-माने रक्षा विशेषज्ञ और विश्लेषक अब इस कड़वी सच्चाई को खुलेआम स्वीकार करने लगे हैं कि जब तक भारत इस समूह का एक प्रमुख संस्थापक और प्रभावशाली सदस्य है, तब तक पाकिस्तान का ब्रिक्स की दहलीज पर पहुंचना असंभव है। पाकिस्तानी एक्सपर्ट्स का यह तीखा और दो टूक बयान ऐसे समय में सामने आया है जब इस्लामाबाद के हुक्मरान लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए छटपटा रहे हैं, लेकिन उनकी अपनी ही आर्थिक और आंतरिक नीतियां उनके रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा बन गई हैं।
ब्रिक्स समूह का बढ़ता वैश्विक प्रभाव और पाकिस्तान की महत्वकांक्षाएं
ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और इसके नए सदस्य देश) आज के समय में ग्लोबल इकॉनमी और जियोपॉलिटिक्स का एक ऐसा शक्तिशाली ध्रुव बन चुका है जो पश्चिमी देशों के वर्चस्व वाले वित्तीय संस्थानों को कड़ी चुनौती दे रहा है। दुनिया भर के कई विकासशील देश इस संगठन की बढ़ती आर्थिक ताकत, अपनी मुद्रा में व्यापार करने की पहल और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के कारण इसके सदस्य बनने के लिए लालायित हैं। पड़ोसी देश पाकिस्तान भी लंबे समय से यह हसीन ख्वाब देख रहा है कि वह किसी तरह ब्रिक्स की सदस्यता हासिल कर ले ताकि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में उसकी गिरती हुई साख को कुछ सहारा मिल सके और उसकी चरमराई हुई अर्थव्यवस्था को ऑक्सीजन मिल सके। लेकिन पाकिस्तान की इन महत्वकांक्षाओं पर जिओपॉलिटिकल समीकरणों और भारत के कड़े कूटनीतिक रुख के कारण पानी फिरता नजर आ रहा है।
पाकिस्तानी एक्सपर्ट की दो टूक- भारत क्यों नहीं होने देगा पाकिस्तान की एंट्री
पाकिस्तान के एक प्रमुख राजनीतिक और रणनीतिक विश्लेषक ने हाल ही में एक टीवी डिबेट और अपने विश्लेषण में बहुत ही बेबाकी से यह बात कही है कि पाकिस्तान को ब्रिक्स में शामिल होने की उम्मीद पूरी तरह छोड़ देनी चाहिए। इस एक्सपर्ट का साफ तौर पर मानना है कि ब्रिक्स के नियमों के अनुसार किसी भी नए सदस्य को शामिल करने के लिए सभी मौजूदा सदस्य देशों की सहमति (Consensus) आवश्यक होती है, और भारत कभी भी पाकिस्तान को इस समूह में घुसने नहीं देगा। भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों से चले आ रहे द्विपक्षीय तनाव, आतंकवाद के मुद्दे और क्षेत्रीय सुरक्षा के विवादों के चलते नई दिल्ली के लिए यह संभव ही नहीं है कि वह पाकिस्तान जैसे देश को अपने साथ एक मंच पर बैठने की अनुमति दे। भारत की वैश्विक कूटनीतिक पकड़ इतनी मजबूत है कि वह ब्रिक्स के अन्य सदस्य देशों के साथ मिलकर पाकिस्तान के हर दांव को आसानी से नाकाम कर सकता है।
अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत- आतंकवाद और आर्थिक बदहाली बनी पहचान
पाकिस्तानी एक्सपर्ट ने अपनी ही सरकार और हुक्मरानों को आईना दिखाते हुए कहा है कि दूसरों पर दोष मढ़ने से पहले पाकिस्तान को अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए कि उसकी आज यह दुर्गति क्यों हुई है। दुनिया का कोई भी जिम्मेदार आर्थिक मंच या संगठन ऐसे देश को अपने साथ कभी नहीं जोड़ना चाहेगा जिसकी पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद के प्रायोजक, राजनीतिक अस्थिरता और दिवालिया होने की कगार पर खड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में होती है। पाकिस्तान की आर्थिक हालत यह है कि उसे अपने देश का रोजमर्रा का खर्च चलाने और कर्ज चुकाने के लिए आईएमएफ (IMF) के सामने कटोरा लेकर खड़ा होना पड़ता है। जिस देश में कानून का राज न हो, राजनीतिक उठापटक और सेना का हस्तक्षेप चरम पर हो, और जो खुद अपनी जनता को बुनियादी सुविधाएं देने में असमर्थ हो, उसे ब्रिक्स जैसे प्रतिष्ठित और तेजी से बढ़ते आर्थिक संगठन में भला कौन जगह देगा।
भारत की मजबूत ग्लोबल कूटनीति और पाकिस्तान की कूटनीतिक हार
यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर इस बात को साबित करता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आर्थिक ताकत, राजनीतिक स्थिरता और मजबूत नेतृत्व का कितना बड़ा महत्व होता है। आज वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति एक 'विश्वमित्र' और दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित हो चुकी है, जिसके बिना किसी भी बड़े ग्लोबल फैसले की कल्पना नहीं की जा सकती है। इसके विपरीत पाकिस्तान अपनी गलत नीतियों और प्रायोजित आतंकवाद के कारण वैश्विक स्तर पर पूरी तरह अलग-थलग पड़ चुका है। ब्रिक्स में पाकिस्तान के प्रवेश को लेकर आया यह बयान इस बात का जीवंत प्रमाण है कि पाकिस्तान के भीतर भी अब लोग यह स्वीकार करने लगे हैं कि जब तक देश की मूल नीतियों में सुधार नहीं होगा और भारत विरोधी मानसिकता को छोड़कर आर्थिक विकास पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक ऐसे ही अपमानजनक झटके मिलते रहेंगे।