सिंधु जल समझौते पर भारत का कड़ा रुख, अंतरराष्ट्रीय कोर्ट के फैसले की परवाह किए बिना अपनी शर्तों पर अडिग

सिंधु जल समझौते पर भारत का कड़ा रुख, अंतरराष्ट्रीय कोर्ट के फैसले की परवाह किए बिना अपनी शर्तों पर अडिग

भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों से चले आ रहे सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty - IWT) विवाद ने एक बार फिर नया मोड़ ले लिया है। अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration) के तमाम फैसलों और पाकिस्तान की तरफ से लगातार डाली जा रही अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव की रणनीतियों के बावजूद भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस मामले में पूरी तरह अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देगा। भारत ने अंतरराष्ट्रीय अदालत की उन कार्यवाहियों और आपत्तियों को सिरे से खारिज कर दिया है जिनमें संधि में बदलाव या तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की बात कही गई थी। नई दिल्ली का रुख बेहद साफ है कि सिंधु जल संधि जैसे संवेदनशीलता से जुड़े मामलों पर किसी भी बाहरी या अंतरराष्ट्रीय अदालत के आदेश को भारत पर जबरन थोपा नहीं जा सकता। भारत की इस बेबाक नीति ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वह अपने रणनीतिक और जल सुरक्षा हितों के साथ किसी भी सूरत में समझौता करने को तैयार नहीं है, जिससे इस्लामाबाद की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं।

क्या है पूरा मामला और क्यों गरमाया है सिंधु जल संधि का मुद्दा

सिंधु जल संधि पर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव तब और अधिक गहरा गया जब पाकिस्तान ने भारत की पनबिजली परियोजनाओं (Hydroelectric Projects), विशेष रूप से किशनगंगा और रावल जैसी परियोजनाओं के डिजाइन पर आपत्ति जताते हुए हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। पाकिस्तान की मुख्य शिकायत यह थी कि भारत इन परियोजनाओं के जरिए सिंधु नदी बेसिन के पानी के बहाव को नियंत्रित कर रहा है, जो 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में साइन हुई सिंधु जल संधि के प्रावधानों का उल्लंघन है। पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह प्रोपेगंडा फैलाने की कोशिश की कि भारत अंतरराष्ट्रीय नियमों की धज्जियां उड़ा रहा है और पश्चिमी नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित कर रहा है। लेकिन भारत ने शुरू से ही इस बात पर जोर दिया है कि मध्यस्थता अदालत का गठन ही संधि के नियमों के खिलाफ जाकर अवैध तरीके से किया गया है, इसलिए इसके द्वारा दिए जाने वाले किसी भी फैसले या मध्यस्थता का भारत के लिए कोई कानूनी आधार नहीं बनता है।

पाकिस्तान की हर कूटनीतिक चाल हुई बेकार, भारत ने अपनाई सख्त नीति

पाकिस्तान ने वैश्विक मंचों पर भारत को घेरने के लिए हर संभव कूटनीतिक और कानूनी दांव-पेंच आजमाए, लेकिन भारत की मजबूत और अडिग विदेश नीति के आगे उसकी हर चाल पूरी तरह नाकाम साबित हुई। इस्लामाबाद लगातार यह कोशिश कर रहा था कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के जरिए भारत को उसकी जल विद्युत परियोजनाओं पर काम रोकने के लिए मजबूर किया जाए। इसके जवाब में भारत ने साफ कर दिया कि सिंधु जल संधि के तकनीकी और कानूनी पहलुओं को सुलझाने के लिए एक निश्चित द्विपक्षीय तंत्र (Bilateral Mechanism) मौजूद है और इसमें किसी भी तीसरे पक्ष या मध्यस्थ की कोई आवश्यकता नहीं है। भारत सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं करता और सीमा पार से होने वाली हरकतों पर लगाम नहीं कसता, तब तक जल जैसे संवेदनशील मुद्दों पर एकतरफा बातचीत संभव नहीं है। भारत के इस सख्त रुख ने पाकिस्तान के उन मंसूबों पर पानी फेर दिया जिनके तहत वह अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति हासिल करना चाहता था।

तकनीकी और कानूनी मोर्चे पर भारत की मजबूत पकड़ और निष्पक्षता

भारत की कानूनी और तकनीकी टीमों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह साबित कर दिया है कि उसकी सभी पनबिजली परियोजनाएं पूरी तरह से सिंधु जल संधि के नियमों के दायरे में रहकर ही डिजाइन और संचालित की जा रही हैं। संधि के तहत पूर्वी नदियों (सतलुज, व्यास और रावी) का पानी पूरी तरह भारत के उपयोग के लिए है, जबकि पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम और चेनाब) के पानी के इस्तेमाल का कुछ सीमित अधिकार भारत को रन-ऑफ-द-रिवर (Run-of-the-River) परियोजनाओं के रूप में दिया गया है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय अदालत के उन दावों को भी खारिज कर दिया जो पाकिस्तान के पक्ष में सहानुभूति रखते हुए दिए गए थे। भारत का पक्ष रहा है कि संधि में विवादों के निपटारे के लिए 'न्यूट्रल एक्सपर्ट' (Neutral Expert) की नियुक्ति का प्रावधान है, और भारत उसी कानूनी रास्ते पर चलने को तैयार है, न कि किसी ऐसी मध्यस्थ अदालत के जो भारत की सहमति के बिना बनाई गई हो। इस दो टूक कानूनी रणनीति ने पाकिस्तान के सभी दावों को कमजोर कर दिया है।

भारत के रणनीतिक फैसलों से पाकिस्तान में मची खलबली

भारत द्वारा सिंधु जल संधि में संशोधन की मांग और अंतरराष्ट्रीय अदालत के फैसलों को नजरअंदाज किए जाने से पाकिस्तानी हुक्मरानों और वहां की अर्थव्यवस्था में खलबली मच गई है। पाकिस्तान पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट, ऊर्जा की कमी और जल संकट से जूझ रहा है, ऐसे में भारत के साथ जल कूटनीति के मोर्चे पर मिल रही लगातार शिकस्त ने वहां के नीति निर्माताओं की नींद उड़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब कूटनीतिक रूप से काफी मजबूत स्थिति में है और वह पाकिस्तान की हर उकसावे वाली कार्रवाई का मुंहतोड़ जवाब देने में पूरी तरह सक्षम है। भारत ने यह संदेश बहुत स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते, और यदि पाकिस्तान को जल समझौते पर कोई वैध बात करनी है, तो उसे पहले अपने आंतरिक आतंकवाद के ढांचे को समाप्त करना होगा और द्विपक्षीय मंच पर आना होगा।

भविष्य की जल कूटनीति और भारत का आत्मनिर्भर विजन

आने वाले दिनों में सिंधु जल संधि का यह विवाद दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। भारत जिस प्रकार से अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए अंतरराष्ट्रीय दबावों के आगे झुकने से इनकार कर रहा है, वह एक मजबूत और आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर पेश करता है। जलवायु परिवर्तन और जल संसाधनों की कमी के इस दौर में भारत का यह रुख पूरी तरह से उसके भविष्य की ऊर्जा और कृषि सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुकूल है। पाकिस्तान की तमाम शिकायतें और अंतरराष्ट्रीय अदालतों के कागजी फैसले भारत के इस दृढ़ संकल्प को हिला नहीं पाए हैं कि देश की जल नीतियों का निर्धारण केवल और केवल नई दिल्ली के राष्ट्रीय हितों के आधार पर होगा, न कि इस्लामाबाद या किसी बाहरी अदालत के दबाव में।