पाकिस्तान में बदला संविधान और झुका कानून, आर्मी चीफ असीम मुनीर ने कैसे बचाया सेना का 300 एकड़ का रियल एस्टेट साम्राज्य

पाकिस्तान में बदला संविधान और झुका कानून, आर्मी चीफ असीम मुनीर ने कैसे बचाया सेना का 300 एकड़ का रियल एस्टेट साम्राज्य

पड़ोसी देश पाकिस्तान से इस समय एक ऐसी बड़ी खबर सामने आ रही है जो वहां की राजनीति, सेना और न्यायपालिका के बीच चल रहे वर्चस्व की जंग की पोल खोलती है। पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर के प्रभाव के चलते देश के संविधान और कानूनों में ऐसे नाटकीय बदलाव किए गए हैं जिससे सेना के व्यावसायिक हितों और रियल एस्टेट कारोबार को कानूनी रूप से पूरी तरह सुरक्षित कर लिया गया है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में रावलपिंडी और इस्लामाबाद के बीच का वह हाई-प्रोफाइल 300 एकड़ का बेशकीमती रियल एस्टेट प्रोजेक्ट है, जिस पर लंबे समय से विवाद चल रहा था। सेना प्रमुख ने अपनी रणनीतिक चालों और राजनीतिक दबाव का इस्तेमाल करके यह साबित कर दिया है कि पाकिस्तान में कानून और संविधान वही दिशा तय करते हैं जो सेना चाहती है, जिससे वहां के आम नागरिकों और लोकतांत्रिक संस्थाओं में भारी निराशा और चिंता का माहौल है।

पाकिस्तानी सेना का व्यावसायिक साम्राज्य और रियल एस्टेट का जाल

पाकिस्तान में सेना केवल देश की सीमाओं की रक्षा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह देश के सबसे बड़े व्यावसायिक घरानों में से एक के रूप में भी जानी जाती है। सेना के नियंत्रण वाले विभिन्न फाउंडेशन और हाउसिंग अथॉरिटीज देश भर में बड़े पैमाने पर कॉमर्शियल मॉल, हाउसिंग सोसाइटीज, सीमेंट प्लांट, बेकरी और उर्वरक कारखाने संचालित करते हैं। पिछले कुछ दशकों में पाकिस्तानी सेना ने रक्षा भूमि के नाम पर देश के प्रमुख शहरों में प्राइम लोकेशन्स पर हजारों एकड़ जमीन पर कब्जा किया है और उसे कमर्शियल रियल एस्टेट में बदलकर अरबों-खरबों रुपये का कारोबार खड़ा किया है। इसी विशाल साम्राज्य के तहत रावलपिंडी और इस्लामाबाद के सीमावर्ती इलाकों में लगभग 300 एकड़ की एक अत्यंत मूल्यवान भूमि आती है, जिस पर कई तरह के कानूनी पेंच फंसे हुए थे और अदालतों में मामले चल रहे थे।

अदालती फैसलों और कानूनी शिकंजे से बचने के लिए संविधान में संशोधन

पिछले कुछ महीनों से इस 300 एकड़ के विवादित रियल एस्टेट प्रोजेक्ट को लेकर पाकिस्तानी अदालतों में सुनवाई तेज हो गई थी और न्यायपालिका इस बात की जांच कर रही थी कि क्या सैन्य जमीनों का इस तरह से व्यावसायिक उपयोग करना कानूनी रूप से वैध है या नहीं। अदालतों के संभावित कड़े रुख और फैसलों से अपनी व्यावसायिक संपत्तियों को बचाने के लिए सेना ने सत्ता के गलियारों में अपनी ताकत का पूरा इस्तेमाल किया। जनरल असीम मुनीर और सैन्य तंत्र के इशारे पर संसद के माध्यम से देश के संविधान और संबंधित कानूनों में ऐसे चतुर संशोधन पारित करवाए गए, जिन्होंने सेना के व्यावसायिक उपक्रमों और भूमि उपयोग को सभी प्रकार की न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह मुक्त कर दिया। इस संवैधानिक बदलाव के बाद अब कोई भी अदालत सेना के इन रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स पर सवाल नहीं उठा सकती है और कानून को सेना के हितों के अनुकूल पूरी तरह झुका दिया गया है।

लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी और राजनेताओं की विवशता

पाकिस्तान में इस घटना ने एक बार फिर से यह स्पष्ट कर दिया है कि वहां की चुनी हुई राजनीतिक सरकारें और संसद केवल नाममात्र की हैं, और असली सत्ता की चाबी हमेशा रावलपिंडी स्थित जनरल हेडक्वार्टर (GHQ) के पास ही रहती है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली सरकार और गठबंधन दलों के नेताओं ने सेना के दबाव में आकर बिना किसी विरोध के इन संशोधनों को संसद में पास होने दिया। विश्लेषकों का मानना है कि राजनेता अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए सेना के हर इशारे पर नाचने को मजबूर हैं। जब देश की अर्थव्यवस्था भीषण संकट से गुजर रही है, आम जनता महंगाई और बेरोजगारी के दलदल में धंस रही है, तब देश के संसाधनों और जमीनों का इस्तेमाल आम जनता के कल्याण के बजाय सेना के व्यावसायिक और आर्थिक साम्राज्य को और मजबूत करने के लिए किया जा रहा है।

आम जनता का आक्रोश और पाकिस्तान के भविष्य पर मंडराते काले बादल

पाकिस्तान के आम नागरिकों और स्वतंत्र बुद्धिजीवियों के बीच इस बात को लेकर तीव्र आक्रोश है कि कैसे सेना ने अपने चंद बड़े जनरलों और अधिकारियों के निजी व संस्थागत आर्थिक हितों के लिए पूरे देश के संविधान को गिरवी रख दिया है। सोशल मीडिया और स्वतंत्र मंचों पर लोग खुलकर इस बात की आलोचना कर रहे हैं कि देश की रक्षा के नाम पर मिलने वाले बजट और जमीनों का उपयोग एक कॉर्पोरेट घराने की तरह मुनाफा कमाने के लिए किया जा रहा है। इस पूरी घटना से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पाकिस्तान की छवि को बड़ा धक्का लगा है, क्योंकि यह साबित हो गया है कि वहां लोकतंत्र केवल एक दिखावा है और असलियत में यह एक 'सैन्य राज्य' है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो पाकिस्तान का आर्थिक और सामाजिक ढांचा पूरी तरह चरमरा सकता है, जिसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।