इंसाफ कोर्ट में होगा या टीवी स्क्रीन पर? वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने जस्टिस वर्मा का जिक्र कर क्यों उठाया यह बड़ा सवाल?
News India Live, Digital Desk: आजकल हम सब देखते हैं कि किसी भी बड़े मामले में पुलिस की जांच या कोर्ट का फैसला आने से पहले ही टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर एक अलग ही अदालत सज जाती है। जिसे हम और आप 'मीडिया ट्रायल' के नाम से जानते हैं। इसी मुद्दे पर देश के जाने-माने वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने एक ऐसी बात कही है, जो न सिर्फ कानून जगत के लिए बल्कि हम आम नागरिकों के लिए भी बहुत मायने रखती है।
अदालत का फैसला या शोर-शराबा?
मौका था दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के विदाई समारोह का। विदाई की घड़ी वैसे भी भावनाओं से भरी होती है, लेकिन मुकुल रोहतगी ने इस मौके का इस्तेमाल एक बहुत गहरी बात कहने के लिए किया। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा कि आजकल जिस तरह से मीडिया किसी व्यक्ति को रातों-रात दोषी ठहरा देता है, वह बहुत खतरनाक है।
जरा सोचिए, एक इंसान अपनी पूरी जिंदगी मेहनत और ईमानदारी से एक मुकाम बनाता है, लेकिन मीडिया की अधूरी खबरों और हेडलाइंस का दबाव उसकी बनी-बनाई इज्जत पर सवाल खड़े कर देता है। रोहतगी का कहना था कि यह "हल्ला-गुल्ला" न्याय प्रक्रिया के लिए सही नहीं है।
जस्टिस वर्मा का उदाहरण क्यों था खास?
इस मुद्दे को समझाने के लिए मुकुल रोहतगी ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खुद के जीवन का एक वाकया याद दिलाया। एक वक्त ऐसा भी था जब जस्टिस वर्मा को भी मीडिया ट्रायल का शिकार होना पड़ा था और उन्हें काफी आलोचना झेलनी पड़ी थी। सोचिए उस वक्त उन पर क्या गुजरी होगी? लेकिन जैसा कि कहा जाता है, सच परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं।
रोहतगी ने याद दिलाया कि कैसे जस्टिस वर्मा ने उन मुश्किल हालातों का सामना बड़ी मजबूती से किया और अपनी गरिमा बनाए रखी। उन्होंने अपने काम से जवाब दिया और यह साबित किया कि बाहर कितना भी शोर क्यों न हो, न्याय की कुर्सी पर बैठकर सिर्फ कानून और अंतरात्मा की आवाज सुनी जानी चाहिए।
हम सबके लिए सबक
मुकुल रोहतगी की यह चेतावनी सिर्फ मीडिया के लिए नहीं है, यह एक तरह से समाज के लिए भी है। न्यायपालिका लोकतंत्र का एक बहुत मजबूत स्तंभ है। अगर हम टीवी बहसों को ही फैसला मान लेंगे, तो अदालतों का महत्व कम हो जाएगा। रोहतगी ने बातों-बातों में समझा दिया कि एक जज का काम कितना दबाव भरा होता है, जहाँ उसे भीड़ की आवाज को अनसुना कर सिर्फ और सिर्फ तथ्यों पर ध्यान देना होता है।
आखिरकार, न्याय जल्दबाजी में नहीं, धैर्य और सबूतों से मिलता है। मीडिया ट्रायल भले ही टीआरपी दिला दे, लेकिन किसी की छवि और न्याय व्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ता है। मुकुल रोहतगी का यह बयान हमें रुककर यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम स्क्रीन पर जो देख रहे हैं, वह पूरा सच है भी या नहीं?