श्रीकृष्ण के एक हाथ में हमेशा लड्डू क्यों रहता है? इसके पीछे छिपी है एक भक्त की दिल छू लेने वाली कहानी
News India Live, Digital Desk: हममें से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसके घर के मंदिर में नन्हे, घुटनों के बल चलते हुए भगवान कृष्ण की मूर्ति न हो। हम उन्हें बड़े प्यार से नहलाते हैं, कपड़े पहनाते हैं और 'लड्डू गोपाल' (Laddu Gopal) कहकर बुलाते हैं।
लेकिन क्या आपने कभी उस मूर्ति को गौर से देखा है? उनके एक हाथ में हमेशा एक लड्डू (मोतीचूर या बेसन का लड्डू) होता है। कभी सोचा है कि माखन चोर कहलाने वाले कन्हैया के हाथ में माखन की मटकी के बजाय लड्डू क्यों है? और उनका नाम लड्डू गोपाल कैसे पड़ गया?
इसके पीछे एक बहुत ही प्यारी और भावुक कर देने वाली पौराणिक कथा है।
एक भक्त, उसका नियम और भगवान की लीला
ब्रज भूमि में एक बहुत ही परम भक्त रहा करते थे, जिनका नाम था कुंभनदास (कुछ कहानियों में एक पुजारी का भी ज़िक्र आता है)। उनके पास भगवान श्रीकृष्ण का बाल रूप था। वे अपने कन्हैया को बिल्कुल अपने बेटे की तरह मानते थे। उनका एक नियम था वे भगवान को भोग लगाए बिना खुद अन्न का एक दाना भी नहीं खाते थे।
एक बार की बात है, पुजारी जी को कहीं बाहर जाना था। उन्होंने भोग के लिए थाली सजाई, जिसमें प्रेम से बने हुए लड्डू रखे थे। उन्होंने मन ही मन बाल गोपाल से कहा, "लला, मैं जा रहा हूँ, भोग लगा लेना।"
जब मूर्ति से साक्षात प्रकट हुए भगवान
कहते हैं कि भगवान तो बस भाव के भूखे होते हैं। भक्त की सच्ची पुकार सुनकर नन्हे बाल गोपाल मूर्ति से बाहर निकल आए। उन्होंने थाली से एक लड्डू उठाया और मजे से खाने लगे। अभी उन्होंने एक लड्डू खाया ही था और दूसरा लड्डू हाथ में उठाया ही था कि तभी वहां कोई आ गया (कुछ कथाओं के अनुसार खुद पुजारी जी लौट आए थे)।
अपने भक्त को अचानक देखकर नन्हे कान्हा हड़बड़ा गए। उस हड़बड़ी में वे वापस मूर्ति के रूप में बदल गए, लेकिन इस बार उनका रूप थोड़ा अलग था।
हाथ में रह गया लड्डू और बस गए वो 'लड्डू गोपाल'
जब भक्त ने देखा, तो हैरान रह गए। भगवान अपनी पुरानी मुद्रा (Pose) में नहीं थे, बल्कि उनके एक हाथ में आधा खाया हुआ लड्डू था और दूसरे हाथ में लड्डू पकड़ा हुआ था। मानो वे खाते-खाते रुक गए हों।
उस दिन के बाद से भगवान के इसी बाल रूप की पूजा होने लगी। भक्तों ने मान लिया कि हमारे कान्हा को लड्डू बहुत प्रिय है। बस तभी से उनका नाम 'लड्डू गोपाल' पड़ गया।
यह कहानी हमें सिखाती है कि अगर प्यार और 'भाव' सच्चा हो, तो भगवान पत्थर की मूरत से भी बाहर आ सकते हैं। तो अगली बार जब आप अपने लड्डू गोपाल को देखें, तो याद रखिएगा कि वो सिर्फ एक मूर्ति नहीं, बल्कि एक भक्त के प्रेम की निशानी हैं।