मुंबई फतह कर ली, फिर भी उदास क्यों है बीजेपी? इस ऐतिहासिक जीत के पीछे छिपा है एक गहरा दर्द

Post

News India Live, Digital Desk: अक्सर जब कोई पार्टी चुनाव जीतती है, तो दफ्तर में ढोल-नगाड़े बजते हैं और कार्यकर्ता एक-दूसरे को गुलाल लगाते हैं। मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव 2026 के नतीजे आने के बाद बीजेपी (BJP) खेमे में खुशी तो है, लेकिन वो 'जोश' नजर नहीं आ रहा जिसकी उम्मीद की जा रही थी।

जी हाँ, खबरों के मुताबिक, बीजेपी ने बीएमसी में ऐतिहासिक जीत दर्ज की है और मुंबई पर अपना झंडा गाड़ दिया है, लेकिन पार्टी का शीर्ष नेतृत्व (Top Leadership) इन नतीजों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है।

आखिर ऐसा क्यों? जब मुंबई, जिसे देश की आर्थिक राजधानी कहा जाता है, उसकी सत्ता हाथ में आ गई, तो फिर गम कैसा? चलिए, इस जीत के अंदर की कहानी को डिकोड करते हैं।

'मिशन 150+' का सपना टूटा

बीजेपी की नाराजगी की सबसे बड़ी वजह है अपने खुद के टारगेट को पूरा न कर पाना।
बीजेपी जब चुनाव मैदान में उतरी थी, तो उसका लक्ष्य सिर्फ 'जीतना' नहीं था, बल्कि 'क्लीन स्वीप' करना था। पार्टी ने कथित तौर पर "मिशन 150" या उससे ज्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य रखा था। मकसद साफ़ था विरोधी दलों (खासकर उद्धव ठाकरे गुट और कांग्रेस) को इतना कमजोर कर देना कि वो अगले 10-20 साल तक उठ न सकें।

नतीजे बता रहे हैं कि बीजेपी को बहुमत (Majority) तो मिल गया, या वो सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन वह उस "जादुई आंकड़े" तक नहीं पहुँच पाई जो उन्होंने सोचा था। मतलब साफ़ है विपक्ष अभी भी जिन्दा है और मजबूती से सांस ले रहा है।

गठबंधन की बैसाखी या अपनी ताकत?

सूत्र बताते हैं कि बीजेपी को उम्मीद थी कि इस बार मुंबईकर उन्हें 'एकतरफा' प्यार देंगे और वो अपने दम पर पूरा सदन चला सकेंगे। लेकिन अगर आंकड़े ऐसे हैं कि उन्हें अभी भी छोटे दलों या गठबंधन के सहयोगियों (शिंदे गुट/अजित पवार गुट) पर बहुत ज्यादा निर्भर रहना पड़ेगा, तो यह बीजेपी जैसी महत्वाकांक्षी पार्टी के लिए 'आंशिक खुशी' जैसा ही है।

पार्टी को लगता है कि मुंबई के इन्फ्रास्ट्रक्चर और विकास पर इतना काम करने के बाद भी, अगर एक बड़ा तबका वोट नहीं दे रहा, तो कहीं न कहीं रणनीति में चूक हुई है।

भविष्य का डर

बीजेपी के रणनीतिकार जानते हैं कि अगर आज विपक्ष पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, तो विधानसभा चुनावों में वे फिर सिर उठा सकते हैं। यही वो "कसक" है जो ऐतिहासिक जीत के बाद भी नेताओं को चैन से बैठने नहीं दे रही है। जीत मिली है, पर वो 'दबदबा' नहीं मिला जिसकी उम्मीद थी।

खैर, राजनीति में जो जीता वही सिकंदर होता है। अब मेयर बीजेपी का होगा, लेकिन आने वाले दिनों में पार्टी के अंदर बड़े बदलाव और आत्ममंथन का दौर देखने को मिल सकता है।