मालवीय के भाजपा छोड़ने पर आखिर क्यों खुश हैं गोविंद सिंह डोटासरा? राजस्थान की राजनीति का एक कड़वा सच
News India Live, Digital Desk : राजस्थान की राजनीति किसी रोमांचक थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है। कल तक जो एक-दूसरे को कोस रहे थे, आज गले मिल रहे हैं और जो गले मिल रहे थे, वो रास्ता बदल चुके हैं। इसी कड़ी में ताज़ा और सबसे बड़ी चर्चा है महेंद्रजीत सिंह मालवीय की। एक समय पर कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे मालवीय ने बड़े धूम-धड़ाके के साथ भाजपा का दामन थामा था, लेकिन अब खबर यह है कि वहां भी उनके पैर नहीं जम सके।
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इस पर जो कटाक्ष किया है, उसने इस मुद्दे को और भी हवा दे दी है। चलिए, आसान शब्दों में समझते हैं कि ये पूरी कहानी आखिर है क्या।
भाजपा में 'अजनबी' जैसा एहसास?
महेंद्रजीत सिंह मालवीय जब कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए थे, तब उन्हें उम्मीद थी कि उनकी साख और आदिवासी बेल्ट (वागड़) में उनकी पकड़ के चलते उन्हें कुछ बड़ा मिलेगा। लेकिन कहते हैं न कि राजनीति में जगह खुद बनानी पड़ती है, कोई थाली में परोस कर नहीं देता। जानकार कहते हैं कि मालवीय खुद को भाजपा की कार्यप्रणाली में ढाल नहीं पाए। जिस पार्टी को वह सालों से हराते आ रहे थे, वहां खुद को सहज कर पाना उनके लिए लोहे के चने चबाने जैसा था।
डोटासरा की वो 'मीठी' चुटकी
जैसे ही मालवीय के भाजपा छोड़ने या अनबन की खबरें सामने आईं, गोविंद सिंह डोटासरा ने अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ कह दिया कि, "हमें तो पहले से ही पता था कि वहां क्या होने वाला है।" डोटासरा का मानना है कि जो लोग विचारधारा को भूलकर सिर्फ़ कुर्सी के लिए पार्टी बदलते हैं, उनका अंत ऐसा ही होता है। उनके बयानों से एक बात साफ़ है—कांग्रेस फिलहाल उन्हें 'बांहे फैलाकर' स्वागत करने के मूड में शायद नहीं है, लेकिन वे इस स्थिति का आनंद ज़रूर ले रहे हैं।
वागड़ की राजनीति पर क्या होगा असर?
महेंद्रजीत सिंह मालवीय राजस्थान के बांसवाड़ा-डूंगरपुर क्षेत्र के सबसे पुराने खिलाड़ियों में से एक हैं। वहां का वोट गणित काफी हद तक व्यक्तिगत रसूख पर चलता है। अब जब वह किसी किनारे के नहीं दिख रहे, तो आने वाले उपचुनावों या राज्यसभा की गणित में वहां के समीकरण पूरी तरह पलट सकते हैं। सवाल अब यह है कि क्या मालवीय फिर से कोई 'नई राह' चुनेंगे या फिर से पुरानी पार्टी में घर वापसी के लिए मिन्नतें करेंगे?
एक सबक हर राजनेता के लिए
मालवीय का यह राजनीतिक सफर हमें एक बहुत ज़रूरी बात सिखाता है। राजनीति सिर्फ़ मंचों से दी जाने वाली रैलियों तक सीमित नहीं है। इसमें सम्मान, धैर्य और अपनी जड़ों से जुड़े रहना बहुत ज़रूरी है। जब कोई बड़ा कद वाला नेता अपनी मूल पार्टी छोड़ता है, तो जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं की नजरों में वह अपना थोड़ा भरोसा ज़रूर खो देता है।
अब देखना यह है कि राजस्थान की तपती गर्मी के बीच मालवीय का अगला कदम कौन सा गुल खिलाएगा।