मकर संक्रांति और खिचड़ी सिर्फ़ एक पकवान नहीं, हमारी आस्था और जुझारूपन की कहानी

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News India Live, Digital Desk : जनवरी का आधा महीना बीतते ही हम सबके घरों में 'खिचड़ी' की तैयारी शुरू हो जाती है। उत्तर भारत के कई राज्यों (खासकर यूपी और बिहार) में तो इस त्योहार को कहते ही 'खिचड़ी' हैं। हम गंगा में नहाते हैं, खिचड़ी दान करते हैं और बड़े चाव से खाते भी हैं। लेकिन क्या आपने कभी अपनी दादी या नानी से पूछा है कि आख़िर इस खास दिन खिचड़ी ही क्यों? रसगुल्ले या हलवा क्यों नहीं?

इसके पीछे एक बहुत पुरानी और वीरता से भरी कहानी छिपी है, जिसका रिश्ता 'बाबा गोरखनाथ' से है।

जब लड़ाई के मैदान में कम पड़ा राशन...
कहा जाता है कि खिलजी के शासनकाल के दौरान जब आक्रांता देश पर हमले कर रहे थे, तब नाथ संप्रदाय के योगी उनका डटकर मुकाबला कर रहे थे। उस संघर्ष के दौरान योगी अक्सर कई-कई दिनों तक भूखे रहते थे, क्योंकि उनके पास खाना बनाने का वक्त नहीं होता था। भारी भोजन करने से आलस आता और कम खाने से कमजोरी।

ऐसे समय में बाबा गोरखनाथ ने एक समाधान निकाला। उन्होंने दाल, चावल और सब्जियों को एक साथ मिलाकर पकाने की सलाह दी। यह पकवान जल्दी तैयार हो जाता था, पचने में हल्का था और शरीर को जबरदस्त ताकत देता था। योगियों को यह 'खिचड़ी' इतनी पसंद आई कि इसने उन्हें संघर्ष के दौरान ऊर्जा से भरे रखा। बाबा गोरखनाथ की इसी सीख को सम्मान देने के लिए गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर में 'खिचड़ी मेला' लगने लगा और आज भी वहाँ भक्त बड़े प्रेम से खिचड़ी चढ़ाते हैं।

सिर्फ़ पेट नहीं भरता, यह ग्रह भी ठीक करता है!
खिचड़ी को हमारे यहाँ 'संतुलित आहार' का दर्जा मिला है। ज्योतिष के नज़रिए से देखें तो इसके पीछे भी एक दिलचस्प तर्क है:

  • चावल को चन्द्रमा का प्रतीक माना जाता है।
  • उड़द की दाल शनि का प्रतिनिधित्व करती है।
  • हल्दी बृहस्पति से जुड़ी है।
  • घी सूर्य और मंगल को शांति देता है।
  • सब्जियाँ बुध ग्रह के करीब मानी जाती हैं।
    मतलब, खिचड़ी का एक प्याला हमारे ग्रहों को भी संतुलित करने का तरीका है।

दान की वो एक मुट्ठी का महत्व
मकर संक्रांति पर हम नई फसल का दान करते हैं। उड़द की काली दाल और नए चावल का दान सिर्फ़ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह किसान की मेहनत का सम्मान और गरीबों के साथ अपनी समृद्धि को बांटने का ज़रिया है। उस दिन किसी जरूरतमंद के घर जब आपकी दी हुई खिचड़ी का चूल्हा जलता है, तो असल मायने में मकर संक्रांति तभी सफल होती है।