अमित शाह ने आखिर क्यों कहा असम के महानायक? गोपीनाथ बोरदोलोई का वो साहस जिसे हर भारतीय को जानना चाहिए
News India Live, Digital Desk : जब भी हम भारत की आज़ादी और राज्यों के एकीकरण की बात करते हैं, तो अक्सर हमारे ज़ेहन में सरदार पटेल का नाम आता है। लेकिन भारत के पूर्वोत्तर में, खास तौर पर असम के लिए एक और नाम उतना ही बड़ा और सम्मानीय है गोपीनाथ बोरदोलोई।
अमित शाह ने हाल ही में असम में उन्हें याद करते हुए श्रद्धा सुमन अर्पित किए, लेकिन सवाल ये है कि नई पीढ़ी इस 'लोकप्रिय' जननायक को कितना जानती है? हकीकत ये है कि आज अगर असम और पूरा उत्तर-पूर्व भारत का एक अटूट हिस्सा है, तो उसका बहुत बड़ा श्रेय बोरदोलोई जी के अटूट साहस को जाता है।
वो कठिन समय जब असम पर संकट था
विभाजन के उस दौर में एक 'ग्रुपिंग फॉर्मूला' लाया गया था, जिसके तहत असम को पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के साथ जोड़ने की कोशिश की गई थी। वह वक्त ऐसा था जब असम के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा हो गया था। उस समय गोपीनाथ बोरदोलोई एक मजबूत दीवार की तरह खड़े हो गए। उन्होंने न केवल इस फॉर्मूले का पुरजोर विरोध किया, बल्कि महात्मा गांधी और सरदार पटेल तक अपनी बात पहुँचाई कि असम कभी भी अलग नहीं होगा।
असम के पहले 'खेवनहार'
1946 में वे असम के प्रधानमंत्री (जो अब मुख्यमंत्री कहलाता है) बने और आज़ादी के बाद राज्य के पहले मुख्यमंत्री रहे। लेकिन उनकी चुनौती केवल सियासत तक सीमित नहीं थी। उनके सामने एक ऐसा प्रदेश था जिसे गरीबी, अशिक्षा और विभाजन के घावों से बाहर निकलना था। उन्होंने शिक्षा और संस्कृति पर ज़ोर दिया। आज जो 'गुवाहाटी यूनिवर्सिटी' हम देख रहे हैं, वह उन्हीं की दूरदर्शी सोच का परिणाम है।
अमित शाह की भावुक यादें
अमित शाह ने 2025 के इस आयोजन में ठीक ही कहा कि गोपीनाथ बोरदोलोई का जीवन हमें राष्ट्रभक्ति का पाठ सिखाता है। वे सिर्फ़ एक राजनेता नहीं थे, वे एक ऐसे समाज सुधारक थे जो 'गांधीवादी' मूल्यों में गहरा यकीन रखते थे। उनकी सादगी का आलम ये था कि इतनी बड़ी पावर में रहने के बावजूद वे हमेशा जनता के सेवक बने रहे। 1999 में भारत सरकार ने उन्हें 'भारत रत्न' (Bharat Ratna) देकर उनकी तपस्या का सम्मान किया, जो हालांकि उन्हें बहुत पहले मिल जाना चाहिए था।
हकीकत का एक आईना
अक्सर इतिहास के पन्नों में पूर्वोत्तर के नायकों को वो जगह नहीं मिल पाई जिसके वे हकदार थे। लेकिन अब समय बदल रहा है। आज जब असम विकास की नई राह पर है, तो उसकी नींव रखने वाले इंसान 'लोकप्रिय' गोपीनाथ बोरदोलोई को याद करना सिर्फ़ औपचारिकता नहीं, बल्कि एक नागरिक के तौर पर हमारा कर्तव्य है।
हमें अपने बच्चों को बताना होगा कि सरहद पर सिर्फ़ गोलियों से ही जंग नहीं जीती जाती, कभी-कभी दृढ़ इच्छाशक्ति और अटूट कलम से भी अपनी जमीन बचाई जाती है। गोपीनाथ बोरदोलोई असम की उसी इच्छाशक्ति का नाम है।