कतर से कब होगी कमांडर पूर्णेंदु तिवारी की मुकम्मल वापसी? देश को है अपने अधिकारी का इंतज़ार

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News India Live, Digital Desk : बीते कुछ महीनों में कतर से जो खबरें आईं, उन्होंने हर भारतीय को राहत भी दी और थोड़ा बेचैन भी किया। याद कीजिए जब मौत की सजा सुनाए जाने के बाद भारत के आठ पूर्व नौसेना अधिकारियों की घर वापसी हुई थी। उस पल को पूरे देश ने दीपावली की तरह मनाया था। लेकिन उस उत्सव के बीच एक चेहरा ऐसा था जिसके लिए आज भी प्रार्थनाएं की जा रही हैं और डिप्लोमैटिक गलियारों में चर्चाएं जारी हैं कमांडर पूर्णेंदु तिवारी।

पूरी कहानी क्या है?
कतर की जेल में लंबे वक्त तक बंद रहने के बाद, भारत सरकार की कोशिशों के रंग लाए और सात अधिकारी तो सुरक्षित घर लौट आए, लेकिन कमांडर पूर्णेंदु तिवारी को लेकर मामला थोड़ा पेचीदा रहा। हालांकि उनकी मौत की सजा को बदल दिया गया था और उनकी रिहाई का रास्ता भी खुला था, लेकिन तकनीकी वजहों या क़ानूनी पेच के कारण उनकी पूरी तरह भारत वापसी में चुनौतियां बनी हुई हैं। ताज़ा जानकारी के मुताबिक, उन्हें लेकर एक बार फिर प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है।

विदेश मंत्रालय (MEA) क्या कर रहा है?
अक्सर लोग पूछते हैं कि जब बाकी सब आ गए तो एक क्यों रुक गए? भारत के विदेश मंत्रालय का रुख इस मामले में बहुत स्पष्ट है। वे लगातार कतर के अधिकारियों के संपर्क में हैं। विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि कमांडर पूर्णेंदु तिवारी की सुरक्षा और उनकी भारत वापसी उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। मामला दो देशों के बीच के नियमों और कतर के आंतरिक कानूनों का है, इसलिए भारत सरकार बहुत ही सावधानी से और सम्मानजनक तरीके से हर कदम आगे बढ़ा रही है।

एक अधिकारी की देशसेवा का सम्मान
कमांडर पूर्णेंदु तिवारी का करियर शानदार रहा है और उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है। एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा नौसेना और देश की गरिमा को समर्पित कर दिया हो, उसका इस तरह से एक दूसरे देश में अटके रहना उनके परिवार और देश के लिए भावुक पल है।

क्या उम्मीद है आगे?
अभी इस मामले में डिप्लोमैटिक बातचीत (Quiet Diplomacy) का दौर चल रहा है। कई बार ऐसी संवेदनशील चर्चाएं कैमरे के सामने नहीं की जातीं ताकि अधिकारी की सुरक्षा या रिहाई के मामले में कोई बाधा न आए। पूरा देश अब इसी इंतज़ार में है कि कब वह दिन आएगा जब कमांडर पूर्णेंदु तिवारी भी उसी आज़ाद हवा में सांस लेंगे और अपने परिवार के पास होंगे।

सच्चाई तो यही है कि उम्मीदों का दीया अभी बुझा नहीं है, और भारत की मज़बूत डिप्लोमेसी ने पहले भी मुमकिन को नामुमकिन करके दिखाया है।