उमर खालिद की रिहाई में रोड़ा कौन? ओवैसी के इस तीखे सवाल ने विपक्षी एकता की पोल खोल दी
News India Live, Digital Desk : भारतीय राजनीति में जब भी जेल और जमानत की बात आती है, तो बहस अक्सर सरकार बनाम विपक्ष पर आकर टिक जाती है। लेकिन हाल ही में असदुद्दीन ओवैसी ने इस पूरी चर्चा का रुख ही मोड़ दिया है। उमर खालिद और शर्जील इमाम जैसे चेहरों की लंबी होती कैद को लेकर ओवैसी ने सीधे-सीधे कांग्रेस को घेर लिया है। उनका कहना है कि आज जिस 'कड़े कानून' की दुहाई दी जा रही है, उसकी नींव तो दरअसल कांग्रेस के दौर में ही रखी गई थी।
मुद्दा क्या है?
अक्सर देखा जाता है कि विपक्षी दल सरकार पर जांच एजेंसियों और कानूनों के दुरुपयोग का आरोप लगाते हैं। लेकिन ओवैसी ने एक पुरानी फाइल खोल दी है। उन्होंने साफ़ लफ्जों में कहा कि 'गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम' यानी UAPA को इतना सख्त बनाने का श्रेय यूपीए (UPA) सरकार को जाता है। उनका तर्क सरल है—अगर आपने खुद एक मज़बूत जंजीर बनाई है, तो आज उस जंजीर के कसने पर शोर क्यों मचा रहे हैं?
उमर खालिद और शर्जील इमाम का ज़िक्र क्यों?
उमर खालिद और शर्जील इमाम काफी लंबे समय से जेल में हैं और उनकी जमानत के आवेदन बार-बार खारिज हो जाते हैं। ओवैसी का मानना है कि इन लोगों की स्थिति के लिए सिर्फ मौजूदा सिस्टम ज़िम्मेदार नहीं है, बल्कि वह कानून भी ज़िम्मेदार है जिसे कांग्रेस ने मज़बूत किया था। ओवैसी अक्सर यह आरोप लगाते हैं कि जब मुस्लिमों या एक्टिविस्टों के अधिकारों की बात आती है, तो कांग्रेस अपनी सुविधा के अनुसार स्टैंड बदल लेती है।
बातों ही बातों में बड़ा संदेश
इस बयान के जरिए ओवैसी सिर्फ कानून की बात नहीं कर रहे, बल्कि वह मुस्लिम वोट बैंक को एक संदेश दे रहे हैं। वह यह जताना चाहते हैं कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही उनके मुद्दों पर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब UAPA में संशोधन हो रहे थे, तब कांग्रेस ने उसे पास करवाने में मदद की थी, और अब वही कानून एक ऐसी चुनौती बन गया है जिससे पार पाना मुश्किल हो रहा है।
निष्कर्ष: क्या वाकई कानून ही है असली विलेन?
जानकार मानते हैं कि कानून अपनी जगह है और उसकी व्याख्या अपनी जगह। लेकिन ओवैसी की इस टिप्पणी ने इंडिया गठबंधन (I.N.D.I.A Alliance) के भीतर एक नई दरार पैदा कर दी है। एक तरफ जहाँ विपक्षी पार्टियां एकजुट होकर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं, वहीं दूसरी तरफ ऐसे बयान बताते हैं कि पुरानी यादें और लिए गए फैसले इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ते।
राजनीति की इस बिसात पर अब देखना यह है कि कांग्रेस इन आरोपों का क्या जवाब देती है और क्या वाकई जेलों में बंद इन एक्टिविस्टों का मुद्दा आने वाले समय में और भी बड़ा राजनीतिक रंग लेगा।