Varuthini Ekadashi 2026 : पुण्य लाभ के लिए जानें सही तारीख, शुभ मुहूर्त और पंचक की सावधानी
News India Live, Digital Desk: हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को 'वरुथिनी एकादशी' के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु के 'मधुसूदन' स्वरूप की पूजा करने से व्यक्ति को सौभाग्य प्राप्त होता है और समस्त पापों का नाश होता है। साल 2026 में यह एकादशी बेहद खास संयोगों के साथ आ रही है। यदि आप भी इस व्रत को रखने की योजना बना रहे हैं, तो तिथि और नियमों को लेकर स्पष्टता होना आवश्यक है।
वरुथिनी एकादशी 2026: तिथि और पारण का समय
पंचांग की गणना के अनुसार, इस वर्ष वरुथिनी एकादशी की तिथि 12 अप्रैल की शाम से शुरू हो रही है, लेकिन उदयातिथि के महत्व के कारण व्रत अगले दिन रखा जाएगा:
एकादशी तिथि प्रारंभ: 12 अप्रैल 2026, शाम 07:11 बजे से।
एकादशी तिथि समाप्त: 13 अप्रैल 2026, रात 08:35 बजे तक।
व्रत की मुख्य तारीख: 13 अप्रैल 2026 (सोमवार)।
पारण (व्रत खोलने) का समय: 14 अप्रैल को सुबह 05:57 से 08:31 के बीच।
सावधान! एकादशी पर रहेगा 'पंचक' का साया
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, अप्रैल के इस सप्ताह में पंचक काल भी सक्रिय रहेगा। हालांकि पंचक में पूजा-पाठ और व्रत करना वर्जित नहीं है, लेकिन अन्य मांगलिक कार्यों में सावधानी बरतनी चाहिए:
पंचक काल का समय: 12 अप्रैल की सुबह 10:21 बजे से 17 अप्रैल की सुबह 05:39 बजे तक।
सावधानी: पंचक के दौरान दक्षिण दिशा की यात्रा, घर की छत डलवाना या लकड़ी/ईंधन इकट्ठा करने जैसे कार्यों से बचना चाहिए। एकादशी का व्रत करने वालों के लिए यह समय भक्ति के लिए श्रेष्ठ है।
वरुथिनी एकादशी: क्या करें और क्या न करें?
इस व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में कुछ कड़े नियम बताए गए हैं:
क्या करें: भगवान विष्णु को पीले फूल, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें। इस दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व है, विशेषकर अन्न और जल का दान सर्वश्रेष्ठ माना गया है। रात्रि में श्री हरि के कीर्तन का आयोजन करें।
क्या न करें: एकादशी के दिन चावल खाना पूरी तरह वर्जित है। इसके अलावा मसूर की दाल, शहद, और कांसे के बर्तन में भोजन करने से बचें। व्रत के दौरान मन में किसी के प्रति द्वेष या क्रोध न लाएं और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।
व्रत का धार्मिक महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, वरुथिनी एकादशी का व्रत रखने से वही पुण्य फल मिलता है जो कुरुक्षेत्र में सूर्य ग्रहण के समय स्वर्ण दान करने से मिलता है। यह व्रत न केवल भौतिक सुख प्रदान करता है, बल्कि मृत्यु के पश्चात मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करता है। जो जातक शारीरिक व्याधियों से परेशान हैं, उनके लिए यह व्रत आरोग्य प्रदान करने वाला माना गया है।