सजावटी बन गया है UN? ट्रंप का नया बोर्ड ऑफ पीस हकीकत बना, तो बदल जाएगा दुनिया को देखने का नज़रिया

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News India Live, Digital Desk: पूरी दुनिया पिछले कई सालों से देख रही है कि रूस-यूक्रेन का युद्ध हो या मिडिल ईस्ट की अशांति, 'संयुक्त राष्ट्र' (UN) मीटिंग्स और निंदा प्रस्तावों से आगे बढ़कर शायद ही कुछ कर पाया है। अब खबर ये आ रही है कि अमेरिका के दोबारा राष्ट्रपति बनने जा रहे डोनाल्ड ट्रंप इस 'सिस्टम' से कुछ ज्यादा ही नाराज़ हैं। कहा जा रहा है कि ट्रंप UN के विकल्प के तौर पर एक नया 'पीस बोर्ड' (Board of Peace) बनाने का मन बना चुके हैं।

ट्रंप की नाराजगी की असली वजह?
जो लोग डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति को समझते हैं, वे जानते हैं कि वे उन संस्थाओं में पैसा बर्बाद करने के पक्ष में नहीं रहते जिनका नतीजा शून्य हो। ट्रंप का मानना है कि यूनाइटेड नेशंस अरबों डॉलर खर्च करने के बाद भी दुनिया में शांति बहाल करने में नाकाम रहा है। उनका तर्क है कि जब तक घंटों चर्चा के बाद कोई ठोस कदम उठाया जाता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। इसीलिए, वे एक ऐसा 'कौंसिल' या 'बोर्ड' चाहते हैं, जो सीधे काम करे और देशों के बीच चल रहे युद्धों को बिना किसी कानूनी अड़चन के खत्म करवा सके।

कैसा होगा ट्रंप का 'पीस बोर्ड'?
यह बोर्ड सुनने में थोड़ा फ़िल्मी लग सकता है, लेकिन ट्रंप की रणनीति साफ है। वे चाहते हैं कि कुछ चुनिंदा प्रभावशाली देशों को साथ लेकर एक ऐसा पैनल बनाया जाए जो रूस, यूक्रेन, इज़राइल जैसे देशों से सीधे टेबल पर बात करें और उन्हें 'करो या मरो' वाली डील का विकल्प दें। अगर ऐसा हुआ, तो भविष्य में हम देखेंगे कि दुनिया के बड़े फैसले न्यूयॉर्क के भव्य UN हॉल में नहीं, बल्कि गिने-चुने लोगों के बंद कमरों में होंगे।

क्या ये दुनिया के लिए सही होगा?
यहीं से विवाद शुरू होता है। कुछ जानकारों का मानना है कि अगर UN कमजोर होता है, तो दुनिया की बड़ी शक्तियों की मनमानी बढ़ जाएगी। वहीं, एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो मानता है कि पुराने नियम अब काम नहीं कर रहे। उन्हें लगता है कि ट्रंप का 'शॉर्टकट और रिजल्ट ओरिएंटेड' तरीका शायद रूस और यूक्रेन जैसे युद्धों को वाकई में थाम सके।

भारत पर इसका क्या असर होगा?
भारत काफी समय से UN में सुधार और सिक्योरिटी कौंसिल में अपनी स्थायी जगह की मांग करता रहा है। अगर ट्रंप वाकई कोई नया बोर्ड खड़ा करते हैं, तो भारत के लिए यह किसी बड़े मौके से कम नहीं होगा। अमेरिका की नज़रों में भारत एक अहम शांति दूत है, इसलिए इस 'बोर्ड ऑफ पीस' में भारत की भूमिका काफी बड़ी हो सकती है।

अभी तो ये बातें केवल योजना और कूटनीति के स्तर पर हैं, लेकिन ट्रंप के तेवर देखकर लगता है कि इस बार 'अंतरराष्ट्रीय शांति' के मायने पूरी तरह बदलने वाले हैं।