नैना देवी से ज्वाला जी तक, हिमाचल के इन मंदिरों की कहानी है बेहद खास

नैना देवी से ज्वाला जी तक, हिमाचल के इन मंदिरों की कहानी है बेहद खास

देशभर में इस समय आस्था, भक्ति और उल्लास के साथ मनाए जाने वाले पावन पर्व शारदीय नवरात्रि की धूम चारों तरफ मची हुई है और घर-घर से लेकर मंदिरों तक मां दुर्गा के जयकारों की गूंज सुनाई दे रही है। सनातन संस्कृति में शक्ति की आराधना के इन नौ दिनों का विशेष महत्व होता है, और जब बात मां भगवती के दरबार की हो, तो देवभूमि हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) का नाम सबसे पहले जेहन में आता है। उत्तर भारत की पहाड़ियों के बीच बसा हिमाचल प्रदेश कई प्राचीन और चमत्कारी शक्तिपीठों का प्रमुख केंद्र है, जहां साल भर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। शारदीय नवरात्रि के इस पावन अवसर पर यदि आप भी मां के दर्शन की योजना बना रहे हैं, तो हिमाचल प्रदेश के नैना देवी, ज्वाला जी, चिंतपूर्णी और वज्रेश्वरी जैसे प्रसिद्ध मंदिरों की अनूठी पौराणिक कथाएं, उनका इतिहास और उनका आध्यात्मिक महत्व आपके इस सफर को और अधिक दिव्य बना देगा। आइए एक-एक करके जानते हैं इन पावन धामों के पीछे छिपे उन रहस्यों और कहानियों को जो इन्हें दुनिया भर में खास बनाती हैं।

मां नैना देवी मंदिर: जहां गिरी थीं माता सती की नेत्र और पलकें, बिलासपुर की पहाड़ियों पर बसा है यह दिव्य शक्तिपीठ

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले की शिवालिक पहाड़ियों की सबसे ऊंची चोटी पर स्थित श्री नैना देवी मंदिर (Naina Devi Temple) देश के 51 शक्तिपीठों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और जाग्रत पीठ माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब ब्रह्मांड को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंग विभाजित किए थे, जिसके तहत इस पवित्र स्थान पर माता सती के नेत्र (नयन) गिरे थे। इसी मान्यता के चलते इस स्थान का नाम नैना देवी पड़ा और आज भी भक्त यहां अपनी आंखों के स्वास्थ्य और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए माता के दरबार में हाजिरी लगाते हैं। नवरात्रि के इन नौ दिनों में यहां श्रद्धालुओं का ऐसा सैलाब उमड़ता है कि पूरा पहाड़ी इलाका मां के जयकारों से गूंज उठता है, और मंदिर परिसर को भव्य फूलों व रोशनी से सजाया जाता है।

मां ज्वाला जी मंदिर: जहां बिना किसी ईंधन या तेल के सदियों से जल रही है प्राकृतिक ज्योति, क्या है इसका रहस्य

कांगड़ा घाटी की हरी-भरी वादियों के बीच स्थित ज्वाला जी मंदिर (Jwalamukhi Temple) हिमाचल प्रदेश का एक ऐसा अद्भुत और चमत्कारी शक्तिपीठ है जो अपनी अनोखी प्राकृतिक रचना के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां किसी भी प्रकार की मूर्ति की पूजा नहीं की जाती, बल्कि जमीन के गर्भ से निकलने वाली नौ प्राकृतिक और रहस्यमयी ज्वालाओं की पूजा होती है, जिन्हें माता के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यहां माता सती की जीभ गिरी थी, और आज भी भूगर्भीय स्रोतों से निकलने वाली गैसों के कारण ये ज्योतियां निरंतर प्रज्वलित रहती हैं। मुगलों के शासनकाल में सम्राट अकबर ने इस प्राकृतिक अलाव को बुझाने के लिए नहर का पानी तक डलवा दिया था, लेकिन वह इस दिव्य चमत्कार को बुझाने में पूरी तरह असफल रहा था, जिसके बाद उसने खुद सोने का छत्र चढ़ाकर अपनी भूल का प्रायश्चित किया था। नवरात्रि के दौरान इस पावन धाम की छटा देखने लायक होती है।

चिंतपूर्णी और मां कांगड़ा देवी मंदिर: जहां भक्तों के सारे दुख और चिंताएं हो जाती हैं दूर, श्रद्धालुओं का उमड़ता है तांता

नैना देवी और ज्वाला जी के अलावा हिमाचल प्रदेश में मां चिंतपूर्णी (Chintpurni Temple) और मां ब्रजेश्वरी देवी (Kangra Devi Temple) के दरबार भी भक्तों की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। ऊना जिले में स्थित चिंतपूर्णी मंदिर के बारे में यह मान्यता है कि यहां माता सती का चरण का हिस्सा गिरा था, और जो भी भक्त सच्चे मन से अपनी चिंताओं या दुखों को लेकर यहां आता है, माता उसकी सभी झोलियां भर देती हैं और उसकी सारी चिंताएं दूर हो जाती हैं। वहीं कांगड़ा शहर के बीचों-बीच स्थित बज्रेश्वरी देवी मंदिर अपने भव्य इतिहास और ऐतिहासिक आक्रमणों के बाद भी बार-बार जीर्णोद्धार के लिए जाना जाता है। इन सभी शक्तिपीठों की यात्रा न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह देवभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और संस्कृति से भी रूबरू कराती है, जिससे हर श्रद्धालु का मन आध्यात्मिकता से सराबोर हो जाता है।