ट्रंप का पागलपन नहीं, यह अमेरिका की पुरानी आदत है, ग्रीनलैंड के पीछे क्यों पड़ा है वाशिंगटन?

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News India Live, Digital Desk: कई लोगों ने इसे एक मजाक समझा, तो कईयों ने इसे ट्रंप का बड़बोलापन कहा। डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने तो इसे 'बेतुका' (Absurd) तक कह दिया था, जिस पर ट्रंप काफी नाराज भी हुए थे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ग्रीनलैंड को खरीदने की यह इच्छा सिर्फ ट्रंप के मन की उपज नहीं है?

सच्चाई तो यह है कि अमेरिका दशकों से इस बर्फ से ढके द्वीप पर नजरें गड़ाए बैठा है। आइए, इतिहास के पन्ने पलटते हैं और जानते हैं इस 'रियल एस्टेट डील' का सच।

1946 में भी लगी थी बोली
यह बात आपको शायद चौंका दे, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप से बहुत पहले, साल 1946 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन (Harry Truman) ने भी ग्रीनलैंड खरीदने की कोशिश की थी।

दूसरा विश्व युद्ध (World War II) खत्म ही हुआ था और अमेरिका को समझ आ गया था कि ग्रीनलैंड की 'लोकेशन' कितनी जबरदस्त है। ट्रूमैन ने डेनमार्क को उस समय 100 मिलियन डॉलर का सोना (Gold) देने का ऑफर दिया था। सोचिए, उस जमाने में यह रकम कितनी बड़ी थी! लेकिन डेनमार्क ने साफ मना कर दिया।

इतना ही नहीं, उससे भी पहले 1867 में अमेरिका के विदेश विभाग ने ग्रीनलैंड और आइसलैंड, दोनों को खरीदने का विचार किया था।

अमेरिका आखिर चाहता क्या है?
अब सवाल उठता है कि आखिर अमेरिका को इस बर्फीले द्वीप में इतनी दिलचस्पी क्यों है?

  1. रणनीतिक जगह (Strategic Location): ग्रीनलैंड नक्शे पर ऐसी जगह है जहां से अमेरिका अपने दुश्मनों (खासकर रूस और चीन) पर आसानी से नजर रख सकता है। यहां अमेरिका का 'Thule Air Base' पहले से ही मौजूद है।
  2. कुदरती खजाना: बर्फ के नीचे वहां बेशकीमती खनिज, तेल और गैस के भंडार छिपे हो सकते हैं।
  3. आर्कटिक पर कब्ज़ा: जैसे-जैसे ग्लोबल वार्मिंग से बर्फ पिघल रही है, नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं। अमेरिका वहां अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है।

क्या यह संभव है?
देखिए, ग्रीनलैंड कोई खाली प्लॉट या मकान नहीं है, वो एक स्वायत्त (Autonomous) क्षेत्र है जो डेनमार्क के अधीन आता है। वहां के लोग हैं, उनका अपना सम्मान है। जब ट्रंप ने दोबारा इसे खरीदने की बात छेड़ी, तो वहां के लोगों ने कहा, "हम व्यापार के लिए खुले हैं, लेकिन हम बिकाऊ नहीं हैं।"

तो कुल मिलाकर बात यह है कि अमेरिका की यह 'चाहत' बहुत पुरानी है, लेकिन हर बार उसे डेनमार्क के 'आत्मसम्मान' से टकराकर वापस लौटना पड़ता है। अब ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में यह मुद्दा फिर उठता है या नहीं, यह देखना दिलचस्प होगा।