लखनऊ का वो पत्थर घोटाला जिसने सरकारें हिला दीं ,अब जाकर फँसे LDA के पूर्व अफसर
News India Live, Digital Desk : उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2011-12 का वो दौर कोई नहीं भूल सकता जब लखनऊ और नोएडा में स्मारकों का निर्माण जोरों पर था। हाथी, मूर्तियाँ और गुलाबी पत्थरों के साथ-साथ एक और चीज़ चर्चा में थी भ्रष्टाचार। उस वक्त आरोप लगे थे कि पत्थरों की सप्लाई, तराशाई और ढुलाई में जमकर पैसों की बंदरबाँट हुई। अब, जब सब सोच रहे थे कि शायद धूल जम चुकी है, तभी दो पूर्व LDA अधिकारियों पर कार्रवाई की संस्तुति ने गलियारों में फिर से सरगर्मी बढ़ा दी है।
मामले की गहराई: 11 साल का वनवास क्यों?
कहते हैं कानून के हाथ लंबे होते हैं, भले ही थोड़ा समय लग जाए। इस घोटाले की जांच सतर्कता अधिष्ठान (Vigilance Department) और अन्य कई विंग कर रही थीं। अधिकारियों पर आरोप था कि उन्होंने टेंडरों के वितरण और सामान की खरीद में नियमों की धज्जियाँ उड़ाई थीं। इतने सालों तक जांच की सुस्त रफ्तार पर कई सवाल उठे, लेकिन आखिरकार उन दो चेहरों की पहचान हो गई है जिनकी भूमिका इस 'खेल' में संदिग्ध पाई गई थी।
लखनऊ की सड़कों पर गूँजा 'पत्थर घोटाला'
लखनऊ में बने कांशीराम स्मारक, अंबेडकर स्मारक और इको पार्क जैसे निर्माण कार्यों में जो पत्थर इस्तेमाल हुए, उनकी सप्लाई मिर्जापुर और राजस्थान से की गई थी। जांच में पाया गया था कि जितनी कीमत दिखाई गई, हकीकत में उन पत्थरों और उनकी ढुलाई पर खर्च काफी कम हुआ था। जो करोड़ों रुपये जनता की सुविधाओं पर खर्च होने चाहिए थे, वे कथित तौर पर चंद जेबों में चले गए।
अब आगे क्या होगा?
जिन दो अधिकारियों पर अब शिकंजा कसा गया है, उनमें से कुछ सेवानिवृत्त (Retired) हो चुके हैं या अन्य पदों पर हैं। हालांकि, सरकारी नियम कहते हैं कि रिटायरमेंट भी आपको भ्रष्टाचार के आरोपों से पूरी तरह मुक्त नहीं कर सकती। अब विभाग उनसे इस घोटाले से हुई आर्थिक क्षति की भरपाई की तैयारी कर रहा है और अनुशासनिक कार्यवाही भी शुरू हो गई है।
आम जनता का सवाल
सोशल मीडिया और चौक-चौराहों पर लोग बस यही पूछ रहे हैं कि क्या यह कार्रवाई अंजाम तक पहुँचेगी? क्या वो पैसा वापस सरकारी खजाने में आएगा जो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया था? यह मामला उन सभी लोकसेवकों के लिए एक सबक भी है जो ये समझते हैं कि वक्त बीतने के साथ फाइलें भी दब जाएंगी।
इंसाफ की चक्की धीरे ज़रूर चलती है, लेकिन ये कार्रवाई यह बताने के लिए काफी है कि पारदर्शिता के इस दौर में अब हिसाब तो देना ही होगा।