तिब्बत में धरती फटी! शक्तिशाली भूकंप से डोला दुनिया का छत, आखिर क्यों बार-बार कांपता है यह इलाका?

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News India Live, Digital Desk: दुनिया की छत' कहे जाने वाले तिब्बत के पठारी क्षेत्र में एक बार फिर कुदरत का कहर देखने को मिला है। एक शक्तिशाली भूकंप के झटकों ने पूरे क्षेत्र को हिलाकर रख दिया, जिससे लोगों में अफरा-तफरी मच गई। रिक्टर स्केल पर इसकी तीव्रता ने प्रशासन और वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि, जान-माल के नुकसान का सटीक आकलन किया जा रहा है, लेकिन इस घटना ने हिमालयी क्षेत्र की सुरक्षा पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं।

खौफनाक मंजर: आधी रात को मची चीख-पुकार

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जब भूकंप आया तो इमारतों में कंपन इतना तेज था कि लोग घरों से बाहर निकल आए। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरों में कुछ जगहों पर घरों की दीवारों में दरारें और सड़कों पर पत्थर गिरते हुए देखे जा सकते हैं। राहत एवं बचाव कार्य के लिए स्थानीय प्रशासन को अलर्ट मोड पर रखा गया है।

आखिर तिब्बत में ही क्यों आते हैं इतने भूकंप?

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तिब्बत का क्षेत्र दुनिया के सबसे खतरनाक 'सिस्मिक जोन' (Seismic Zone) में आता है। इसके पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं:

टेक्टोनिक प्लेटों की टक्कर: भारतीय प्लेट (Indian Plate) लगातार उत्तर की ओर खिसक रही है और यूरेशियन प्लेट (Eurasian Plate) से टकरा रही है। इस टकराव के केंद्र में तिब्बत और हिमालय स्थित हैं, जिससे भारी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है और भूकंप के झटके लगते हैं।

ऊर्जा का दबाव: प्लेटों के आपस में दबने से जमीन के नीचे जो ऊर्जा जमा होती है, वह 'फाल्ट लाइन्स' के जरिए बाहर निकलती है, जो विनाशकारी भूकंप का रूप ले लेती है।

हिमालय का उत्थान: हिमालय पर्वत अभी भी ऊपर की ओर बढ़ रहा है। यह भौगोलिक हलचल तिब्बत को भूकंप के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है।

क्या भारत के लिए भी है खतरा?

तिब्बत में आने वाले बड़े भूकंपों का असर अक्सर उत्तरी भारत, नेपाल और भूटान तक महसूस किया जाता है। वैज्ञानिकों की मानें तो हिमालयी बेल्ट में एक 'बड़े भूकंप' (Great Earthquake) की आशंका हमेशा बनी रहती है। तिब्बत की यह ताजा हलचल दिल्ली-NCR समेत उत्तर भारत के लिए एक चेतावनी की तरह है।

आपदा प्रबंधन और तैयारी

चीन सरकार ने प्रभावित इलाकों में सेना और आपदा राहत टीमों को तैनात किया है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कड़ाके की ठंड के कारण बचाव कार्य में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।