रामायण की वो कहानी जो शायद आपने नहीं सुनी कभी एक सुंदर सुंदरी थी ताड़का

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News India Live, Digital Desk: अक्सर हम जब रामायण का जिक्र करते हैं, तो दिमाग में राम, लक्ष्मण और हनुमान जी की तस्वीरें घूमने लगती हैं। लेकिन भगवान राम के जीवन में रावण को हराने से पहले भी कई चुनौतियां आईं। उन्हीं में से एक सबसे प्रमुख थी 'ताड़का'। बहुत से लोग उसे सिर्फ एक खूंखार राक्षसी के तौर पर देखते हैं, लेकिन अगर हम थोड़े पीछे मुड़कर देखें, तो ताड़का की अपनी एक अलग ही दास्तां है।

वो ताड़का जो कभी सुंदर यक्षिणी थी
शायद ही आपको पता हो कि ताड़का असल में राक्षसी कुल की नहीं थी। वह सुकेतु नाम के एक यक्ष की बेटी थी। वह इतनी सुंदर और बलवान थी कि कहा जाता था उसमें एक हज़ार हाथियों की ताकत थी। उसकी शादी सुन्द नाम के व्यक्ति से हुई थी। लेकिन समय का चक्र ऐसा घूमा कि एक बार ताड़का के पति ने ऋषि अगस्त्य का अपमान कर दिया, जिससे नाराज़ होकर ऋषि ने उसे भस्म कर दिया। इसके बाद ताड़का और उसके बेटों (मारीच और सुबाहु) ने जब गुस्से में ऋषि पर हमला किया, तो उन्हें श्राप मिला जिसने ताड़का का रूप बिगाड़ दिया और वह एक डरावनी राक्षसी बन गई।

जब ऋषि विश्वामित्र को पड़ा राम का सहारा
ताड़का के डर से दंडकारण्य वन (जो अब ताड़का वन कहलाने लगा था) में सन्नाटा पसरा रहता था। वह ऋषियों के यज्ञों में बाधा डालती और उन्हें मारकर खा जाती थी। महान ऋषि विश्वामित्र भी उससे परेशान थे। तभी उन्हें याद आए अयोध्या के राजकुमार—राम और लक्ष्मण।

विश्वामित्र राजा दशरथ के पास गए और राम को अपने साथ वन ले जाने की इजाजत मांगी। राम उस वक्त बहुत छोटे थे, लेकिन धर्म की रक्षा के लिए वह अपने भाई लक्ष्मण के साथ निकल पड़े।

राम का वो छोटा सा संकोच
जब राम उस घने जंगल में पहुँचे और ताड़का ने अपनी भयंकर गर्जना से हमला किया, तो एक पल के लिए श्रीराम ठहर गए। उनके मन में सवाल उठा— "क्या एक स्त्री का वध करना उचित है?" राम की रगों में धर्म और मर्यादा बहती थी, इसलिए वे हिचक रहे थे।

तभी गुरु विश्वामित्र ने उन्हें समझाया। उन्होंने कहा, "हे राम! जो बुराई का रास्ता अपना ले और मानवता के लिए खतरा बन जाए, वहां यह नहीं देखा जाता कि वह स्त्री है या पुरुष। एक राजा और रक्षक का धर्म सिर्फ प्रजा की रक्षा करना होता है।" गुरु की आज्ञा मिलते ही श्रीराम ने अपना धनुष ताना और एक ही बाण से ताड़का का अंत कर दिया।

ये कहानी हमें क्या सिखाती है?
ताड़का का अंत कोई सामान्य वध नहीं था। यह श्रीराम के शौर्य की पहली झलक थी। इस घटना से हमें पता चलता है कि समाज में जब बुराई अपनी हदे पार करने लगे, तो उसका विनाश करना ही सबसे बड़ा पुण्य है। साथ ही, यह गुरु और शिष्य के अटूट विश्वास की भी कहानी है।