रामायण का वो रहस्यमयी प्रसंग, जब रामजी के बाण भी हनुमान के सामने हो गए थे फेल, जानिए वजह।
News India Live, Digital Desk : आज 31 दिसंबर 2025 है, और हम अक्सर जीवन में सही और गलत के बीच का फर्क समझते हैं। रामायण की इस कथा में भी एक तरफ गुरु की आज्ञा थी और दूसरी तरफ अपने परम भक्त का जीवन।
यह कहानी प्रभु राम के राज्याभिषेक के बाद की है। एक बार अयोध्या में बहुत बड़ा ऋषि सम्मेलन हुआ, जिसमें नारद मुनि, विश्वामित्र और कई बड़े साधु-संत शामिल हुए। इसी सभा के दौरान नारद मुनि ने हनुमान जी के मन में अनजाने में एक भ्रम पैदा कर दिया या यूँ कहें कि एक ऐसी परिस्थिति बनाई जहाँ से विवाद खड़ा हो गया।
नारद मुनि की वो चाल और विश्वामित्र का क्रोध
सभा के दौरान नारद मुनि ने हनुमान जी से कहा कि उन्हें सभी ऋषियों का स्वागत और वंदन करना चाहिए, लेकिन ऋषि विश्वामित्र का नहीं, क्योंकि वे एक समय में राजा थे (राजर्षि)। हनुमान जी तो ठहरे सरल स्वभाव के भक्त, उन्होंने नारद जी की बात मानकर विश्वामित्र को छोड़कर सभी ऋषियों का सम्मान किया।
विश्वामित्र, जो भगवान राम के गुरु भी थे, इसे अपना बड़ा अपमान समझ बैठे। वे बेहद क्रोधित हो गए और उन्होंने अपनी शक्ति का आभास कराते हुए भगवान राम को आज्ञा दी कि उनके भक्त ने मर्यादा तोड़ी है, इसलिए हनुमान को मृत्यु दंड मिलना चाहिए।
गुरु की आज्ञा और प्रभु राम की दुविधा
भगवान राम हमेशा से अपनी 'रघुकुल रीत' यानी वचनों और गुरु की आज्ञा के पालन के लिए जाने जाते थे। गुरु विश्वामित्र का आदेश टालना उनके लिए असंभव था। दुखी मन से भगवान राम ने यह प्रतिज्ञा की कि वे अगले दिन सूर्योदय से पहले हनुमान का वध कर देंगे।
अयोध्या की गलियों में सन्नाटा छा गया। कोई सोच भी नहीं सकता था कि जो राम और हनुमान एक प्राण हैं, वे आज एक-दूसरे के सामने मौत की लकीर पर खड़े होंगे।
राम नाम की शक्ति का असली चमत्कार
अगली सुबह हनुमान जी को सरयू नदी के तट पर लाया गया। हनुमान जी को इस बात का कोई गम नहीं था कि उनके आराध्य उन्हें सज़ा दे रहे हैं। उन्होंने बस अपनी आँखें बंद कीं और पूरी एकाग्रता से 'राम नाम' का जाप शुरू कर दिया।
जब भगवान राम ने धनुष संभाला और एक-एक करके तीर चलाने शुरू किए, तो करिश्मा ऐसा हुआ कि तीर हनुमान जी को छूने के बजाय उनके पैरों के पास गिर जाते। राम जी ने हर शक्तिशाली शस्त्र का उपयोग किया, लेकिन हनुमान जी के मुख से निकलते "राम" नाम ने उनके शरीर के चारों ओर एक सुरक्षा कवच बना दिया था।
जब ब्रह्मांड डोल उठा...
अंत में, अपनी प्रतिज्ञा और गुरु के आदेश का मान रखने के लिए राम जी ने 'ब्रह्मास्त्र' उठाने का मन बना लिया। यह देख नारद मुनि को अपनी भूल का अहसास हुआ और ऋषि विश्वामित्र भी दंग रह गए। विश्वामित्र ने देखा कि जिस भक्ति पर वे सवाल उठा रहे थे, उसने भगवान के अस्त्रों को भी विफल कर दिया। विश्वामित्र ने तुरंत अपना आदेश वापस लिया और राम जी को उनकी प्रतिज्ञा से मुक्त किया।
इस कहानी से क्या सीख मिलती है?
यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान के रूप से भी ज्यादा शक्तिशाली भगवान का नाम होता है। सच्चा समर्पण और भक्ति बड़ी से बड़ी आपदा को टाल सकती है। यह स्वामी और भक्त के बीच का युद्ध नहीं था, बल्कि दुनिया को 'भक्ति' की ताक़त दिखाने का एक माध्यम था।